yah teesra bandar

दुनिया का शायद ही कोई देश होगा जो अपना स्वतंत्रता दिवस न मनाता हो। स्वतंत्रता का अर्थ ही है कि जब कोई राष्ट्र विदेशी शासन से मुक्त हो अपना एक तंत्र खड़ा करे। वह अपनी मूलधारा से रस ग्रहण करके एक देशी विधान बनाये, उस राष्ट्र के मूल निवासी अपने धर्म, अपने चिंतन, अपने राष्ट्रीय प्रतीकों को पुनः खड़ा करके एक आत्माभिमानी व्यवस्था बनायें। इन अर्थों में देखें तो यह अपना स्वतंत्रता दिवस एक सरकारी मनोरंजन के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। असल में भारत को स्वतंत्रता तो दी ही नहीं गई थी, बल्कि यह तो सत्ता का हस्तांतरण था। पंडित नेहरू और माऊंटबेटन के बीच चैदह अगस्त की उस रात्रि को हुई यह संधि तो सन् 1615 से 1857 तक की गई सभी संधियों से खतरनाक थी। जिस तरह आजकल एक प्रधानमंत्री रजिस्टर में हस्ताक्षर करके नवनिर्वाचित प्रतिनिधि को सत्ता का हस्तांतरण करता है, वैसे ही माऊंटबैटेन ने भी नेहरू को अंग्रेजों की सत्ता सौंपी…संधि के अनुसार इंगलैण्ड ने इस भूखण्ड के दो टुकड़े किये और उन्हें दो ‘डोमेनियन स्टेट’ कहा…डोमेनियन का अर्थ ही है ‘एक राज्य के अन्तर्गत छोटा राज्य’…बोले तो…ब्रिटिश काॅमन वेल्थ के अन्तर्गत एक स्वशासी देश…और काॅमन वेल्थ का अर्थ है…साझी सम्पत्ति…यानि वे सभी देश जो काॅमन वेल्थ के नाम पर बड़ा त्योहार रचते हैं…सभी इंग्लैण्ड और उनकी साझी सम्पत्तियां हैं? तो क्या यही कारण था कि उस पन्द्रह अगस्त को कांग्रेसियों के बार-बार बुलाने पर भी गांधी, नौआखाली से इस तथाकथित समारोह में सम्मिलित होने के लिये दिल्ली नहीं आये, क्यांकि वे इस सत्ता हस्तांतरण को स्वतंत्रता मानने के लिये तैयार नहीं थे।
स्वतंत्रता संग्राम के जो दो सरकारी हीरो राष्ट्र के पटल पर परोसे गये हैं उन्हीं की कृपा से आज अश्वत्थामा की तरह एक घायल भारत हमारे सामने है जिसके माथे पर कश्मीर का कभी न भरने वाला नासूर है, जिसे तथाकथित स्वप्नद्रष्टा नेहरू ने हमें गिफ्ट में दिया है। यदि श्यामा प्रसाद मुखर्जी न होते तो पश्चिम बंगाल भी हमारे हाथ से चला ही गया था, चीन ने पहले तिब्बत हड़पा, फिर हमारा भू-भाग, पर नेहरू की दृष्टि में यह एक बेकार की जमीन थी…दूसरे हीरो ने भी कम कमाल नहीं किये…जब धार्मिक आग्रहों के कारण दो भू-भाग हमसे अलग किये गये, जिसमें कि लगभग तीन चैथाई मुसलमानों ने वोट के जरिये अपनी स्वीकृति दी थी, पर जब पाकिस्तान बना तो कई मुसलमान भारत को अपनी मातृभूमि मानकर यहीं रूक गये…जब कि पाकिस्तानियों ने बड़ी निर्ममता से हिन्दुओं पर क्या जुल्म किये…विज्ञ है। गांधी ने पाकिस्तानी हिन्दुओं को अहिंसा का संदेश दिया और यहां रह रहे मुसलमानों पर अपना सेकुलर छाता तान दिया। गांधी ने अंग्रेजों की भी सुरक्षा की, तभी तो उन पर फिल्म बन सकी..पर वे भगत और उनके साथियों को नहीं बचा सके। पटेल, पाकिस्तान को पचपन करोड़ देने से पूर्व हड़पा गया कश्मीर मांग रहे थे, बापू ने अनशन कर दिया…वे जिन्दगी भर हिन्दुओं के अतिरिक्त सभी की वकालत करते रहे…नेहरू और उनके आकाओं ने राष्ट्रपिता को आगे कर इस देश के मूलनिवासी हिन्दुओं से छल किया…वे तो नोट पर छप गये, पर वह स्वतंत्रता जिसके लिये लाखों लोगों ने बलिदान दिये थे, एक सरकारी समारोह ही बन सकी। गांधी सत्यव्रती थे और देशज अर्थशास्त्र के प्रबल समर्थक भी, पर नेहरू जो तबियत से ही अंग्रेज थे, जिन्होंने सन सत्ताइस से ही गांधी के विचारों का विरोध शुरू कर दिया था, को गांधी ने स्वतंत्र भारत का नेतृत्व क्यों करने दिया? यदि गांधी को इस संधि का मूलस्वरूप ज्ञात था तो उन्होंने नेहरू को आगे करके राष्ट्र के साथ छल क्यों किया? अनशन पर क्यों नहीं बैठे? नेहरू की गद्दी में बैठने की जल्दबाजी के कारण हम आज भी अंग्रेजों के मातहत हैं। ब्रिटेन की रानी आज भी भारत जैसे इकहत्तर देशों की रानी है। भारत आने के लिये ब्रिटेन की महारानी को आज भी वीजा की आवश्यकता नहीं है क्योंकि वह इस संधि के अनुसार अपने ही देश में आ रही है, जबकि हमारे राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री को इंग्लैण्ड जाने के लिये वीजा बनवाना पड़ता है…बोले तो…हम आज भी इग्लैण्ड के उपनिवेश हैं, स्वतंत्र राष्ट्र नहीं। प्रोटोकाॅल के अन्तर्गत केवल राष्ट्रपति को ही इक्कीस तोपों की सलामी दी जाती है, परन्तु जब पिछली बार इग्लैण्ड की रानी भारत आईं तो उन्हें भी इक्कीस तोपों की सलामी दी गई और निमन्त्रण पत्र पर पहले महारानी का नाम था और उसके नीचे राष्ट्रपति का…अर्थात आज भी हमारे देश का राष्ट्रपति, देश का प्रथम नागरिक नहीं है। इन्हीं सब बातों को भांपकर गांधी ने चैदह अगस्त सन् सैंतालिस में नौआखाली की प्रेस कांफ्रेंस में कहा था कि ‘यह तथाकथित आजादी मैं नहीं लाया, इसे सत्ता के लालची लोग हस्तांतरण करके लाये हैं। तो क्या गांधी की तकुली जिसे नेहरू ने पश्चिमी मशीनों के सामने हास्यास्पद बनाया। और क्या वे अनेकानेक विचार जिन्हें सुनकर भारत का पूरा जनमानस गांधीे के पीछे गया, मात्र दिखावा थे? अपनी महान छवि को निखारने के विज्ञापन मात्र थे? या यह भी अंग्रेजों की चाल थी जिसके चलते उन्होनें गांधी दर्शन को ‘हाइप’ करके देश के युवाओं को बकरी बनने पर मजबूर किया। और देश की गद्दी पर ऐसे आदमी को बैठाने का मार्ग प्रशस्त किया जो भारत के शासन को उनकी अमानत समझ कर उनके हितों की निरन्तर रक्षा करता रहे, नेहरू ने अक्षरशः वैसा ही किया…और देशवासी, पन्द्रह अगस्त का भांगड़ा नाचते रहे, इसे भगत-आजाद के स्वप्नों का दिन समझकर, गला फाड़-फाड़ कर नारे लगाते रहे। इतिहास के नीचे छिपे इस डस्टबिन का ढ़क्कन अब खुल रहा है। इस एक स्वयंभू राजनीतिक खानदान ने अंग्रेजों की इस औपनिवेशी दृष्टि को ही शासन का मूलमंत्र समझा…जनता सिंहासन से दूर होती गई, राजनीति का प्रक्षालन करने वाले लोगों का दिल्ली प्रवेश रोक दिया गया, परिणाम स्वरूप सभी विधान सभायें अपराधियों के अड्डे बन गये, राजनीति, चैथ वसूली का माध्यम बन गई और मजा देखिये…जिस स्वतंत्रता दिवस पर हमें अपने मूल्यों की पुनर्समीक्षा करनी थी, उस दिन कई गुन्डे उस तिरंगे की डोरी खींचते हैं, जिसकी रक्षा के लिये सीमा पर डटे हमारे सैनिक, अपनी जान देना, अपनी शान समझते हैं।
आजादी की लड़ाई हिन्दु और मुसलमानों ने एक साथ मिलकर लड़ी, वे मिलजुल कर रहना भी चाहते थे, पर माऊंटबैटेन ने उस संधि में वंदेमातरम् गान को संसद में गाने की अनुमति पचास वर्षों तक यह कह कर नहीं दी कि इससे मुसलमानों की भावनाओं को ठेस पहुंचेगी…चन्द्रशेखर ने इसे पहली बार संसद में गाने की पहल की। मुसलमानों को और भ्रमित करने के लिये अंग्रेजों के वारिस नेहरू ने अल्पसंख्यक का नारा चलाकर सांप्रदायिक विद्वेष के घाव को हरा किया, सिक्ख जो हिन्दु धर्म के रक्षार्थ एक चट्टान बनकर खड़े थे, इंदिरा ने उनमें अलगाव का बीज बोया, राजीव ने तमिलों के मन में न भरने वाले घाव किये, तो सोनिया तो खुलकर हिन्दुओं को दोयम दर्जे का नागरिक बनाने वाले कानून को लेकर ही मैदान में खड़ी हैं, सोनिया का प्रस्तावित काला कानून, हिन्दुओं को जन्मजात दस नम्बरी बनाने के लिये आजाद भारत की संसद में प्रस्तुत होता है और देश का नागरिक लौट-लौट कर सत्ता की चाबी इन्हीं अपराधियों को सौंप देता है…इस स्वतंत्र भारत में जिस मुसलमान राष्ट्रपति को हिन्दुओं ने अपनी आंख पर बिठाया, वह डा0कलाम जो गीता को अपनी प्रेरणा कहते थे, ने भी सोनिया के त्याग की झूठी कहानी गढ़ डाली…क्या राजनीति की सौंध में एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं बच पायेगा, जिस पर राष्ट्र भरोसा करे? या फिर हमेशा की तरह गांधी परिवार ही देश में यह तय करेगा कि कौन योग्य है और कौन अपराधी? ब्रिटेन से छूटे…इटली में अटके…
किधर से स्वतंत्र हैं हम? हल-बैल, गाय-गोबर का अर्थशास्त्र ही हमारा स्वतंत्र था, अंग्रेजों ने उसे जिन्दा ही दफन कर डाला, आखिरी कील उसमें नेहरू की मानसिकता ने ठोंकी, मनमोहन तो अर्थशास्त्र के डुबोने के ही विशेषज्ञ निकले। जिस भारत की उर्वरा भूमि सोना उगलती थी, वहां अब ट्रैक्टर-यूरिया ने मरघट बिछा दिये हैं…पहले किसान फसल पकने पर त्योहार रचता था, तीर्थ स्नान को जाता था, आज वह आत्महत्या करता है। कभी किसान के आंगन में बंधे बैल उसकी समृद्धि के सूचक होते थे, अब किसान खेतों को बेचकर आंगन में कार बांधता है, यह स्वतंत्र भारत में किसान का नया शुभंकर बन रहा है। परतंत्र भारत में भी हमारे ठेठ गांवों का अपना एक तंत्र चलता था, धोबी, लुहार, चमार, तेली, पंडित, कृषक, बनिया…सभी परस्पर निर्भरता के कारण गांव को एक ऐसी स्वतंत्र इकाई की तरह चलाते थे कि उन्हें न तो सरकारी मदद और सब्सिडियों की आवश्यकता थी और न ही पश्चिम का दैत्य उनको चैंका सका था…अब गांवों में टीवी, फ्रिज, केबिल की छतरी है, बिजली की कमी का चिरंतन रूदन है, राजनीतिक दलों के कार्यालय हैं, हर क्षेत्र के दलाल हैं…बोले तो चहुंमुखी प्रगति है…सड़के हैं, बाजार के तड़के हैं, संचार और सड़क से अनेक विश्वस्तरीय चीजें इन गांवों तक पहुंच रही हैं। एक ग्रामीण भी अब डायना के प्रेम प्रसंग पर बहस करता है, सलमान खान का सदेह दर्शन करता है, कसाब पुराण हो या सेकुलर धर्म की शिक्षायें, मनु सिंघवी की पोर्न गाथा हो या महानगरों के दैहिक कर्मकान्ड, हमसे हमारी मानसिकता छीन ली गई है, बहस के केन्द्र बदल दिये गये हैं…अपने पारंपरिक भोजन, रस और रसायन, अपने पहनावे, अपने सम्बोधन…सभी कुछ, विज्ञापनों की आंधी ने उड़ा दिये हैं…बोले तो…सभी गांव अब अति आधुनिक हो गये हैं। अराजकता को ही स्वतंत्रता समझ लिया गया है, नेता-अभिनेता अपनी चकाचैंध से धनार्जन की अंधेरी गलियों के लैम्पपोस्ट बन रहे हैं। नारी को गरम समोसे की तरह विज्ञापनों की कडा़ही में पकाया जा रहा है…साहित्य की तरह एक नई उत्तर स्वतंत्रता, समाज की लक्ष्मण रेखाओं का रोज अतिक्रमण कर रही है। मीडिया और माफिया का अन्तर करना मुश्किल होने लगा है, व्यापारी और दलाल जनता को मूंडने के लिये स्वतंत्र कर दिये गये हैं…और जनता केवल सुनने और सहने के लिये स्वतंत्र है, आखिर उसी के लिये ही तो यह पन्द्रह अगस्त मनाया जाता है…क्यों? अपना तंत्र होता तो अपने कानून होते…पर अंग्रेजों ने अपनी संधि में शर्तें रखीं कि उनके बनाये सभी कानून यथावत रहेंगे, इसीलिये आज भी अंग्रेजों के बनाये 34735 कानून वैसे ही चल रहे हैं। इंडियन पैनल कोड (आई पी सी) जो कि आइरिश पैनल कोड था, में तो केवल आईरिश की जगह इंडिया लिख दिया गया, बाकी की पूरी सामग्री, कौमा, फुलस्टाप तक बदला नहीं गया है। स्वतंत्रता के बाद केवल ईस्ट इंडिया कम्पनी भगाई गई और बाकी 127 विदेशी कम्पनियों को न छेड़ने की शर्त इस संधि में थी…कहते हैं कि मुगल शासकों ने गोहत्या वालों के हाथ कटवाने का कानून बनाया था, अंग्रेजों ने देश भर में कत्लखाने, जुआघर, वेश्यालय और शराब खाने खुलवाये, जिन्हें आजादी के बाद बन्द होना चाहिये था पर नेहरू की आत्मा ‘वेस्टमिन्सटर सिस्टम’ में बंघी थी जिसे कि गाांधी वेश्या कहते थे। गांधीे पूरे सिस्टम को बदलना चाहते थे, बीच में नेहरू खड़े हो गये, जिन पर उनका अगाध स्नेह था। बाबा रामदेव से लोग सवाल पूछते हैं कि वे बाबा हैं तो राजनीति में किसलिये हैं? यह सवाल किसी ने मोहनदास करमचंद गांधी से क्यों नहीं पूछा? उन्हें भी तो अन्तर्राष्ट्रीय सेकुलर मीडिया ‘संत’ कहता रहा है। यदि वे संत थे तो वे राजनीति में क्यों थे? बल्कि उनकी संतई के कारण जितना राजनीतिक नुकसान इस देश का हुआ, उनकी अहिंसा के कारण इतना अपमान हिंन्दुओं ने सहा, कि संतई से ही डर लगने लगता है। गांधी यदि औपनिवेशी शक्तियों के विरूद्ध युद्ध कर रहे थे तो बाबा की लड़ाई भी तो उन्हीं आर्थिक शक्तियों से है। गांधी ने खदी-भंडारों की शृंखला खुलवाईं तो वह व्यापार नहीं विचार हो गया और रामदेव ने इस बाजारी दैत्य से लड़ने के लिये और आयुर्वेद के पुनरूत्थान हेतु संस्थान खड़ा किया तो वे व्यापारी हो गये? गांधी ने जो राजनीतिक गल्तियां की थी, उन्हें दुहराने के लिये रामदेव या अन्ना बाध्य नहीं हैं। महामानव बनने का विज्ञापन करने की आवश्यकता रामदेव को नहीं है, जो रूपया, हवाला से निकल कर देश का दिवाला निकाल रहा हो, उस करंसी पर छपने के लिये, या राष्ट्रपिता बनने के लिये किसी को अब राग सेकुलरी में भजन गाने की आवश्यकता नहीं है। क्षमा करें! स्वतंत्रता के ऐन पर्व पर यह आलोचना राष्ट्रद्रोह न मानी जाये। गांधीवाद पर उंगली उठाना या गांधी की आलोचना आज भी अपने देश में भारत की आलोचना मानी जाती है। उन्हीं के देशनाओं पर चलते हुये, बहुसंख्यक समाज का अनादर आज मानवाधिकार कहा जाता है और अल्पसंख्यकों को दिया जाने वाला विशिष्ठ आतिथ्य धर्मनिरपेक्षिता कही जाती है, वही पुनरावृत्ति…कांग्रेसी नीति सदा चलि आई…यह कांग्रेस ही तय करती है कि कौन संत है और कौन अपराधी, किसका भ्रष्टाचार न्यायालय में दण्डित होगा और किस को बगुला बनाकर विधान की अग्रिम पंक्ति में बैठाया जायेगा। संविधान को ‘पेपर सोप’ बनाकर कांग्रेसियों ने अपने चेहरे उजले करने की एक नई तकनीक विकसित कर ली है, मीडिया को सुनहरी चेन से बांधकर सरकारें, स्वतंत्रता का आनंद ले रही हैं। चैनल, समाचारों को शीर्षासन पर रखता है, मूर्ख और धूर्त लोग नैतिकता का विज्ञापन करने लिये आमंत्रित किये जाते हैं और सृजनशील लोगों को इस शासन में उनकी औकात दिखाकर स्क्रीन के नीचे कबन्ध की तरह दौडा़ दिया जाता है। गांधीजी ने इस देश को तीन बन्दर दिये थे…एक मुंह पर हाथ रखे हुये था जो कालान्तर में मनमोहन सिंह ‘गूंगा’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। दूसरा, जिसकी कि आंखें बन्द थीं,उस धृतराष्ट्र टाईप बन्दर की कई संताने हुईं…कानून का चीरहरण करने वाले, चोरी, डकैती, अपहरण, घूसखोरी का व्यवसाय करने वाले कई बन्दर इसी वंशवृक्ष से निकले हैं…गांधी जी की खादी को राजवस्त्र बनाकर भाई लोग पिछले साठ वर्षों से विधान के आंगन में धमाचैकड़ी मचाये हुये हैं, उ0प्र0 में पिछले दस सालों से वे स्वतंत्रता का सपाई-बसपाई संस्करण प्रस्तुत कर गाांधीवाद को धरातल पर उतार रहे हैं। तीसरा बन्दर…वह बहरा बन्दर…वह सबसे घातक निकला, इसकी कई करोड़ संतानें हुईं और वे अपना चुनावी पहचान पत्र बनाकर भारत के गांवों-शहरों में बस गईं। यदि गूंगे और अंधे बंदरों ने राजनीतिक-सामाजिक अपराध के कीर्तिमान बनाये तो इस तीसरे बंदर की युवा-वृद्ध संतानों ने बहरे बनकर उनसे भी बड़ा अपराध किया है। बैल की तरह नैतिक जुये में जुते रहना, और अन्याय सहना ही तो सबसे बड़ा सामाजिक अपराध है। यदि देश का युवा ऐसे ही बहरा बनकर झूठे इतिहास और लम्पट वर्तमान को देख-सुनकर, बहरा बना रहेगा तो इस स्वतंत्रता दिवस का भी कोई अर्थ नहीं निकाल पायेगा। ब्रिटेन की संसद द्वारा जो ‘भारत की आजादी का कानून-1947’ पास किया गया था, उसका पूरा प्रारूप देश की जनता के सामने रखा जाये, और जनता पर छोड़ा जाये कि वह इसे स्वतंत्रता का दिन मानती है, या एक अपमान करने वाला दिवस…  shakt dhyani

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