बदरंग दोहे . चिन्मय सायर

गोरी सुने बंगले से, कंगलों का शोर,
आर-पार मौसेरे, कौन? पकड़ेगा चोर।

इज्जत हुई तार-तार, कोयला नहीं ब्लैक,
ब्लेक हुआ तिरंगा! जी, सिर्फ नहीं फ्लैग।

आपस में मुंह बजाते, औ’ बोल हुये नीम
कोई तो ढ़ूंढ़ो रे! संविधान में हकीम।

जिस थाली में खावें, उसी में करते छेद
हंसी उड़ावें देश की, नेता करें न खेद।

बोटी-बोटी जनतंत्र, खावें ले-ले स्वाद
बूचड़खाना संसद जी, कहां करें फरियाद।

नेता-पुलिस की दोस्ती, गुंडे हुये उदास
शनैः-शनैः नेता हुये, जनता हुई ग्रास।

अस्मत लुटती देश की, नेता करें किल्लोल
कौन चढ़ेगा तख्त पर, कौन करेगा कौल।

घोटाले दर घोटाले, फिर भी ऊँची नाक
हाथ मलें जी गोरे, क्या लूटा है खाक।

कितना लूटें, क्या लूटें, होड़ मची सरकार
गांधी का स्टेच्यू देखे, देश भक्ति लाचार।

सोचो, भाई लोगों! कैसा है संविधान?
गाल बजाऊ संसद में, मेरा भारत महान।

त्रासदियों के स्नेह निमंत्रण

त्रासदियों के स्नेह निमंत्रण . डाॅ. प्रीतम अपछ्यांण
उत्तराखंड के पूर्व से पश्चिम तक फैली प्राकृतिक आपदा में काल कवलित व जड़हीन हो चुके सभी मनुष्यों के लिए अश्रुपूरित श्रद्धांजली। बाबा केदार व ‘गंगाओं’ के कोप से बच गए हम लोग यदि इस वक्त भी संवेदनहीन हो गए तो यह दूसरी त्रासदी होगी। यह केवल दुःख की घड़ी नहीं है बल्कि जीवन को नए सिरे से स्थापित करने का आरम्भ जैसा है। दो-चार महीनों में ये दुःख समाप्त नहीं होने वाले हैं। अचानक आई इस विपत्ति से जीवन खो चुके युवकों और देश के कोने-कोने से आए श्रद्धालुओं को अंतिम प्रणाम।
ऐसा क्यों हुआ? अब इस बात पर चर्चा अनिवार्य है कि आखिर ऐसा क्यों हुआ? मानसून के सामान्य मौसम से पहले ही इतनी घनी बरसात और तबाही का कारण क्या है? हर तरह के लोग, हर तरह के तर्क दे रहे हैं। श्रीनगर की ‘धारी कालिंका’ को हिलाने का परिणाम इस त्रासदी के रूप में माना जा रहा है परन्तु यह बात गले नहीं उतरती। यदि आस्थावान लोगों के इस तर्क को मान भी लें तो फिर धारी की मूर्ति हिलाने वालों की एक ‘कील’ तक क्यों नहीं बही? बीच नदी में खड़ा उनका ‘डाम’, शाफ्टें, डोजर, ट्रक, रेत के टीले, मशीनें सब तो सुरक्षित रहे, और पूरा केदारनाथ तबाह हो गया! धारीदेवी का इसमें कितना कोप है, कितना नहीं, कहा नहीं जा सकता।Image
कुछ अन्य लोग तर्क दे रहे हैं कि यह शास्त्रोक्त तथ्य था कि जब भी केदारनाथ में दस हजार से अधिक लोग हो जाएंगे, तभी ऐसी तबाही होगी। पता नहीं कि फिर विजयनगर, अगस्त्यमुनि, सिल्ली क्यों नष्ट हो गए? ऋशिकेश, हरिद्वार क्यों बाढ़ग्रस्त हुए? पिण्डरघाटी की तबाही का संबंध केदार की जनसंख्या से कैसे जोड़ा जा सकता है? बहुत से लोगों का मानना है कि धर्म के इन धामों में धर्म नाम की कोई चीज नहीं बची थी। होटल व मोटेल पिकनिक स्पाॅट हो गए थे। पूजा-अर्चना में वीआईपी टाइप का आरक्षण लागू हो गया था और दुकानों में ग्राहक देवता ‘बलि के बकरे’ बन गए थे। सामाजिक परिवर्तनों के ये प्रभाव सत्य हो सकते हैं परन्तु इनसे भी बादल फटना, आकस्मिक बाढ़, भूस्खलन व नेस्तनाबूद हो जाने का संबंध नहीं जोड़ा जा सकता। आस्थाओं के माध्यम से इसे तबाही का कारण भले ही मान लिया जाय पर सिर्फ इससे बात स्पष्ट नहीं होती।
वैज्ञानिक बिरादरी का राग थोड़ा अलग किस्म का है। नासा के सेटेलाइट चित्रों से ग्लेशियरों की हलचल को अनदेखा करना तबाही का कारण माना जा रहा है। ऐसी हलचलें तो हर वर्ष ग्लेशियरों में होती रहती है फिर तबाही का यह मंजर इसी साल क्यों? इतनी बड़ी जनहानि को प्राकृतिक कारणों से संबद्ध नहीं किया जा सकता। प्राकृतिक कारण अवस्थापनाओं को बहा सकते हैं परन्तु ‘जन’ को तो लापरवाही ने ही मारा है।
त्रासदियों के स्नेह निमंत्रण: सड़कों की राजनीति-उत्तराखंड और उसमें भी गढ़वाल का भूगोल, शेष भारत के भूगोल से काफी भिन्न है। यहां तक कि हिमालयी राज्यों में भी गढ़वाल जैसा भूगोल नहीं है। पड़ोसी कुमाऊँ में भी भौगोलिक स्थितियां गढ़वाल से भिन्न हैं। डाॅ. चारण ने कई स्थलों व गड्डियों को ‘पर्वत द्वीप’ नाम दिया है। गदेरों व नदियों के जाल ने सम्पूर्ण धरातल को कई-कई घाटियों व धारों में काट डाला है। रही सही कसर भूगर्भिक बनावटों ने पूरी की है। हर भ्रंश में एक नदी है और हर बसासत के नीचे परतदार चट्टानें, जिनके खिसकने की सर्वाधिक संभावनाएं होती हैं। बहुत सारी बसासतें तो टैलस (पुराने मलबे के ढेर) के ऊपर ही बसी हैं। तलहटी का एक पत्थर खिसका तो पूरा ढेर धड़धड़ा जाएगा। पिण्डरघाटी की सड़कें इसी कारण टूटती रहती हैं।
ऐसे भूगोल में अधिवासों तक सड़कें बनाने का कोई वैज्ञानिक नियम नहीं है। राजनीति की चैसर पर एक ही पहाड़ी, सैकड़ों मोड़ वाली सड़क काट डालती है क्योंकि उस पहाड़ी पर ‘नेता’ का गांव होता है। ‘चैंदकोट जनशक्ति मार्ग’ को छोड़कर संभवतः एक भी सड़क गढ़वाल में बिना राजनैतिक हस्तक्षेप के नहीं बनी है। जहां प्राकृतिक कारणों से सड़क बनाने की संभावना शून्य हैं, वहां भी जबरदस्ती सड़कें बनी हैं और ऐसी कि जिन पर शायद कई-कई किमी तक कोई बसासत ही नहीं है।
विकास के पैमाने-इस तथ्य से कोई इंकार नहीं कर सकता कि विकास का रास्ता सड़कों से ही गुजरता है। जब तक हर बसासत सड़क मार्ग से नहीं जुड़ती, तब तक कोई भी स्वयं को विकसित नहीं मान सकता। राज्य के स्तर पर यह तथ्य बेहद अफसोसनाक है कि विगत 12 वर्षों में सड़क निर्माण की कोई योजना नहीं बन पाई। ऐसे में राज्य के विकास का मापन कैसे हो सकता है?
वर्तमान में विकास का सीधा सा अर्थ है-सुविधाएं, आवास, भोजन, अस्पताल, बैंक-डाकघर, स्कूल, पेयजल, संपर्क-नेटवर्क, विद्युत और स्वच्छता; इतनी ही चीजों से विकास की सामूहिक रूपरेखा बनती है। व्यक्तिगत आय व भौतिक वस्तुओं को जमा करने से सामाजिक विकास नहीं आंका जा सकता। उदाहरण के लिए किसी व्यक्ति के पास अकूत धन है पर राशन उपलब्ध नहीं या लेटेस्ट माॅडल की कार है पर सड़क नहीं है, तो ऐसे में उसे विकसित नहीं कहा जा सकता। धन या कार व्यक्तिगत होती हैं पर सड़क व राशन सामूहिक, इसलिए विकास को व्यक्तिगत तौर पर आंकना गलत होगा। विकास की उक्त सुविधाएं निश्चित तौर पर सड़क मार्ग से ही आती हैं जो उत्तराखंड में किसी नियम में शामिल नहीं हैं।
सड़कांे के निकट लगातार घनी होती जा रही आबादी के पीछे एकमात्र कारण यही है कि वहां सड़क है। ‘रोडहैड’ पर बसना विकास की मानसिकता है जो कतई गलत नहीं है परन्तु बिना किसी नियम के बन रही सड़कों से ‘लोगों को सड़क पर आना’ पड़ रहा है जबकि ‘सड़क को लोगों तक जाना’ चाहिए था।
नदियों का मोह-आपात स्थितियां अपवाद हो सकती हैं परन्तु उत्तराखंड में सामान्य तौर पर सड़क निर्माण में नदियों का मोह दिखता है और यह मोह ही त्रासदियों को निमंत्रण देता है। गढ़वाल की आपदा में इस मोह का परिणाम आज सबके सामने है। नदियों से दूर के गांव व सड़कें सही सलामत हैं परन्तु नदी तटों पर तबाही है। सड़क की लम्बाई कम करने की चाह में नदी का मार्ग चुना जाता है पर यह तथ्य भुला दिया जाता है कि यदि वहां सड़क होगी तो लोग भी बसने आएंगे। आवास व अन्य सुविधाएं जुटाई जाएंगी और दुर्भाग्य से आपदाओं को आमंत्रित किया जाएगा। सड़क की लम्बाई भले ही कितनी हो जाए पर इसका निर्माण संपर्क में आने वाले गांवों के अनुसार किया जाए तो बसासतें नदी तटों पर नहीं खिसकेंगी। अल्मोड़ा, रानीखेत, कौसानी, मसूरी, लैंसडाउन इस बात के प्रमाण हैं कि सड़कें ऊपर रही तो लोग भी ऊपर बसे। ऋषिकेश, देवप्रयाग, कर्णप्रयाग, नंदप्रयाग, चमोली, विष्णुप्रयाग, अगस्त्यमुनि, सतपुली इस बात के उदाहरण हैं कि सड़कें नदी तटों पर र्गइं तो लोग भी खिसककर नीचे आ गए। इस बार ऐसे ही स्थानों पर तबाही का मंजर है। धार्मिक स्थलों व प्रयागांे तक सड़क ले जाना भी एक विडम्बना है। यदि पिण्डर घाटी की सड़क केदारुखाल की सीध में कर्जनमार्ग पर होती हुई ग्वालदम और घूम कर सवाड़, मुंदोली, गंगसार, सणकोट होती हुई नैनीसैंण होती तो आज देवाल, थराली, नारायणबगड़ में इतने घर नहीं बहे होते। दूसरी बात यह कि प्रयागों तक सड़क नहीं भी होती तो भी प्रयाग अपने पूरे महात्म्य के साथ वहीं होते। लोग प्रयागों में फिर भी जाते पर बसते नहीं और बहते नहीं। बद्रीनाथ तक सड़क नहीं होती तो भी ‘बद्री’ का महत्व घटता नहीं। सड़क निर्माण का कोई नियम व वैज्ञानिक आधार न होने से आपदाएं ही तो आमंत्रित होंगी।
बसासतों का विकेंद्रीकरण कीजिए-हमारे देश में और उत्तराखंड में भी विकास का सारा ध्यान शहरों पर है। बसासतों का निरन्तर केंद्रीकरण हो रहा है जो सामाजिक और राजनैतिक समस्याएं पैदा कर रहा है। इस केंद्रीकरण के पीछे भी मुख्य हाथ सड़कों का है। सड़कें गांवों तक ले जाई जांए तो गांवों को सड़क पर खिसककर आने की कोई जरूरत नहीं होगी। उत्पादन को बाजारों तक लाने या वितरण करने में भी समस्या नहीं रहेगी पर ऐसा होता नहीं दिख रहा है। शहरों में झुग्गियों की संख्या निरन्तर बढ़ रही है और ग्रामीण बसासतों व आबाद स्थलों की संख्या लगातार घट रही है। ये घटे हुए लोग कहां जा रहे हैं और क्यों जा रहे हैं? सुविधाओं के लिए सड़क किनारे? परन्तु सड़कें नेताओं की कृपा से बन रही हैं जो बसासतों के केंद्रीकरण के लिए प्रेरित कर रही हैं। आपदा के दिनों में यही केंद्रीकरण इन बसासतों की कब्रगाह बन रहा है।
उपाय क्या है?-इन स्थितियों का स्थाई व प्रभावी उपाय है कि सड़क अधिनियम बनाकर इसे राजनैतिक और प्रशासनिक हस्तक्षेपों से एकदम मुक्त कर दिया जाय। संपूर्ण भूगोल का सर्वेक्षण करके विशेषज्ञों द्वारा सड़क मार्ग का निर्धारण करके, कम से कम विस्फोट व अधिक से अधिक गांवों का जुड़ाव सुनिश्चित किया जाय। सड़क की लम्बाई भले ही कितनी अधिक हो जाय पर एक ही ढलान पर घूम-दर-घूम से बचकर इसका निर्माण किया जाय।
शहरों व कस्बों के लिए नए मानक तय हों कि वहां अधिक से अधिक कितने आवास हो सकते हैं। एक आवास के साथ कितनी खाली भूमि पौधों के लिए रहे। इनके बिना नक्शे पास न हों। सरकारी संस्थान अनुपजाऊ भूमि पर बने और कृषि भूमि उत्पादन के लिए सुरक्षित रखी जाय। एक ही तथ्य शेष रहता है पर्यावरण संरक्षण का। पहला तथ्य इसमें यह है कि उत्तराखंड की आपदाग्रस्त समस्तभूमि को आरक्षित घोषित करके ‘वृक्षविहीन’ वनों का वनीकरण कर दिया जाय। वनों की रक्षा व निर्माण की जिम्मेदारी उन स्थानीय बसासतों को सौंप दी जाय जो ‘नदी मोह की सड़कों पर’ नहीं खिसके हैं। यह वैज्ञानिक तौर पर सिद्ध तथ्य है कि बसासतें जितनी छोटी व अधिक संख्या में होती हैं, पर्यावरण संरक्षण उतना ही अधिक प्रभावी होता है। सुरक्षित सड़कें एक बार का निर्माण होती हैं इसलिए बार-बार कटान की जरूरत नहीं है। एक बार राज्य के सभी सोलह हजार गांव सड़क से जुड़ जायं तो फिर सड़क कटान की जरूरत नहीं। शेष भूमि पर वनों को कोई खतरा नहीं।
सरकारें ऐसा करेंगी, उम्मीद कम है क्योंकि नेता-ठेकेदार-पीडब्ल्युडी- प्रशासन ‘सड़क रिपेयर’ की मुर्गी और वन-पर्यावरण विभाग ‘अड़ंगे की दादागिरी’ नहीं छोड़ने वाले हैं। ये ‘मुआवजा वितरण विभाग’ टाइप की सरकारें हैं। राज्यविकास व जनसुरक्षा की सोच जनता के बीच से ही आएगी। यही सोच राज्य में सड़कों व लोगों का भविष्य तय कर सकेगी।

त्रासदी के बाद

त्रासदी के बाद . डा0 अ0 कीर्तिबर्द्धन
कब मौसम ने घात दी,
कब बरसी बरसात
जितनी भी लाशें दिखीं,
सब किस्मत की बात
अपने गुनाहों का दोष,
बादलों को न दीजिये,
नदियों के रास्ते में
रूकावट न कीजिये।
अपने स्वार्थ में काटकर
वन-वृक्ष सारे,
पर्वतों के तन को
नंगा न कीजिये।

केदारनाथ त्रासदीः-बड़ा हो रहा है दुश्वारियों का पहाड़

केदारनाथ त्रासदीः-बड़ा हो रहा है दुश्वारियों का पहाड़ . बिपिन सेमवालImage
हिमालयी सुनामी का ऐसा कहर बरपा कि, केदारघाटी में अभी तक जिंदगी पटरी पर नहीं लौटी है। त्रासदी को एक माह से ज्यादा का समय बीत गया है, लेकिन फिलहाल केदारघाटी मंे सामान्य स्थिति बहाल होने की संभावना दूर-दूर तक नजर नहीं आ रही हैैं। जहां पहले यात्राकाल में हमेशा भगवान केदारनाथ की पूजा अर्चना लगातार हुआ करती थी, हाल वक्त यहां सारी आध्यात्मिक और धर्मिक गतिविधियां ठप्प हैं। इन दिनों केदारपुरी में खामोशी की चादर ओढ़ रखी है। वहां सेना, एनडीआरएफ, लोनिवि के मजदूर व पुलिस के कुछ जवानों को छोड़कर और कोई नहीं है। माह भर बाद भी पैदल मार्ग नहीं बन पाया है, और हवाई सेवायें केवल नेताओं व रसद ले जाने का कार्य कर रही हैं। दुखदायी पहलू यह कि बाबा के इस धाम में मची तबाही के बाद चंद शवों को निकालने के अलावा और कोई काम आगे नहीं बढ पाया है। मंदिर परिसर, गर्भगृह अभी भी मलबे से अटा पडा है। इस तबाही में दस हजार से अधिक लोग सीतापुर से केदारनाथ के बीच कहां खो गये, इस सवाल का किसी के पास जबाव नहीं है। जो लोग लापता हैं, उनके आश्रितों को मुआवजा देने की प्रक्रिया वेशक शुरू हो गयी है, लेकिन कागज के इन टुकड़ों के वजाय लोगों को अपने प्रियजनों की सकुशल वापसी की ज्यादा अपेक्षा है। तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद उन्हें अपने खोये हुये परिजनों के किसी न किसी दिन घर लौट आने की क्षीण प्रत्याशा जीवित है। यह अलग बात है कि केदारनाथ से सीतापुर तक त्रासदी का जो खौफनाक मंजर आज तक नजर आ रहा है उसे देखते हुये अगर कोई लापता व्यक्ति घर लौट आये तो यह किसी दैवीय चमत्कार से कम नहीं होगा। सोनप्रयाग का पूरा बाजार जहां अपनी बर्बादी की कहानी बयां कर रहा है, वहीं सोनप्रयाग से गौरीकुंड तक आवाजाही के लिये बना वैकल्पिक पुल बनने व बहने का क्रम जारी है। फिलहाल गौरीकुड से जंगल चटटी तक लोनिवि का अमला पैदल मार्ग बना रहा है, लेकिन यहां जगह-जगह पड़ी लाशें या तो चटटानों की तलहटी में हंै, या फिर मलबे में दफन हैं, जिन्हें निकालना असंभव सा है, हांलाकि मार्ग पर पड़ी लाशों का अंतिम संस्कार करने का क्रम जारी है। गौरीकुंड से केदारनाथ तक लगभग दो सौ से अधिक लाशों को अंतिम संस्कार किया जा चुका है। लेकिन त्रस्त करने वाली यह तबाही केदारघाटी के आर्थिक तंत्र का तहस -नहस कर गयी है। कुछ सफेदपेाश ‘गगन बिहारी’ जहां सुर्खियां बटोरने के लिये चुनिंदा महिला पत्रकारों को ‘डिजास्टर टूरिज्म’ की नयी संस्कृति पनपाने की भूमिका निभा रहे हैं, वहीं मानवीय पहलुओं के वजाय कुछ पायलटों का पशु प्रेम इस कदर जागा कि उन्हांेने राहत कार्यों में लगे सरकारी अमले को रसद पहुंचाने से ज्यादा प्राथमिकता एक अदद खच्चर को निकाल लाने को दी।
फिक्रमंदो की तलाश में तरस रही हैं,
कालीमठ घाटी के लोगों की आंखे।
जीवन पटरी पर लौैटेगा,
ये आस अभी भी बरकरार।
तबाही और बर्बादी में खेत खलियान सहित
देवालय भी हुये ध्वस्त।
खेतों मे लगे हैं, छप्पर
आते जाते लोग ही बन रहे हैं सहारा।
तबाही का एक माह से ज्यादा का समय बीत चुका है, देश, दुनियां व सम्पर्क मार्गाें सहित सब बुनियादी व्यवस्थाओं से अलग-थलग पड़ी कालीमठ घाटी की तरफ अभी किसी का ध्यान नहीं दिया गया है। प्रशासन की ओर से कालीमठ से लेकर जाल मल्ला तक व्यवस्थाओं का जायजा लेने के लिये पटवारी तक नहीं गया है, इससे स्वतः ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि क्षेत्र के प्रति शासन-प्रशासन कितना सजग है, हां इतना जरूर है कि बीएसएफ के कमांडेट आर के नेगी के नेतृत्व में 125 जवान क्षेत्र में आवाजाही व्यवस्थाओं के दुरूस्तीकरण में जुटे हैं। क्षेत्र की स्थिति का जायजा लेने के लिये यह संवाददाता कालीमठ घाटी पहुंचा। आपदा के एक माह बाद अब स्थिति पर अगर नजर दौड़ाई जाये तो पाया गया कि केदारनाथ घाटी से अधिक तबाही कालीमठ घाटी में हुयी है। रिड़कोट में पुल बह जाने के कारण बीएसएफ के जवान रस्सों के सहारे क्षेत्र के लोगांे की आवाजाही करा रहे हंै। रोंगटे हिलाने वाले नदी को पार करने का यह मार्ग अपने आप में खौफजदा हैं। यहां दिन भर में तीन-चार सौ लोगों को प्रतिदिन पार कराया जा रहा है, और रोप के माध्यम सेे रसद भी पहंुचायी जा रही है। सभी मार्ग ध्वस्त हैं। लाइफ लाइन कही जाने वाली यहां की सड़कंे और सम्पर्क मार्गाें का दूर-दूर तक अता- पता नहीं है। घोड़े-खच्चर इस मार्ग पर कब तक चलेंगे, यह भी कहना संभव नहीं है।
रोप के माध्यम से मंदाकिनी को पार करने के बाद इन दिनों लोग जैसे-तैसे रिड़कोट के दूसरे छोर पहुंच रहे हैं। यहां से दो किमी की खड़ी चढ़ाई पार करके कालीमठ से आधा किमी पूर्व पहुंचा जा रहा है। यहां लोग भय के मारे खेतों मे झोपड़ी बनाकर जैसे-तैसे दिन काट रहे हैं। एक बुजुर्ग महिला से जब पूछा गया कि वो यहां क्यों है, उन्होंने कहा कि उनका सब कुछ बह गया, तो वह आते-जाते लोगांे को निहारकर ही अपने दिन काट रहे हैं। इससे आगे कालीमठ मंदिर तक पहुंचने के लिये या तो लकड़ी की अस्थाई सीढ़ियां हैं, या हर दस मीटर की दूरी पर सिंगल ऐंगल के सहारे मार्ग को पार किया जा रहा हैं। सभी लोग इसी मार्ग से जान हथेली पर रखकर आवा -जाही कर रहे हैं। कालीमठ मंदिर से पचास मीटर की दूरी पर सन्न करने वाला नजारा ही नजर आया, यहां तबाही के सिवा कुछ भी नजर नहीं आया। आपदा से पूर्व जब कभी यहां पहुचते थे तो मंदिर में भक्तों की भीड़ व घंटियों की ध्वनियां क्षेत्र को गंुजायमान करती रहती थी, अब यहां सन्नाटा पसरा हुआ है। दुकानें सभी बंद हैं, चाय तक नसीब नहीं हो पायी। हां इतना जरूर था कि बीएसएफ ने यहां लंगर लगाया है, आता-जाता व्यक्ति खाना खाकर तृप्त हो रहा है।
शक्ति स्वरूपा मां काली का मुख्य मंदिर भीImage अब गया, तब गया की कगार पर है। बीएसएफ ने मंदिर बचाने का संकल्प ले लिया हैं, व मंदिर के नीचे तारों के माध्यम से वायर क्रेटवाल लगाकर कार्य शुरू कर दिया है। कालीमठ का उपरी इलाका भी भूस्खलन की जद में है, दो हजार से अधिक आबादी वाला यह क्षेत्र तबाही के आंसुओं के सिवाय और कुछ भी बयां नहीं कर रहा है। यहां गांव के बच्चे बामुश्किल मीलों पैदल चलकर विद्यालयों में पहंुच रहे हैं, लेकिन विद्यालय सब बह चुके हैं। कालीमठ का विद्यालय भी आधा बह चुका है, और आधा बहने के कगार पर है।
15- 15 किमी पैदल चलकर शिक्षक विद्यालयों में पहुंच रहे हैं, इससे सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि पठन-पाठन की क्या स्थिति होगीं। यहां सड़कंे, पुल, सम्पर्क मार्ग, बिजली, दूरसंचार व्यवस्थायें समाप्त हो गयी हैं। और अब इस घाटी के लोग गुप्तकाशी से पांच, दस किग्रा रसद ले जाते हुये मार्गों पर दिखे, मार्ग भी वो जो नदियों में ही है। ब्यंूंखी, कुणजेठी, जग्गी वागवान की स्थिति भी कमोवेश ऐसी ही है। भूस्खलन लगातार जारी है। कुणजेठी का प्रा0 विद्यालय दरक चुका है, इस विद्यालय के छात्र तथा शिक्षक कहां हंै इसकी किसी को जानकारी नहीं है।
पैदल मार्ग, जंगलों के मार्ग से सड़क तक बनाया गया है, भयावह उतराई वाले इस मार्ग पर चलना जान जोखिम डालने के जैसा है, लेकिन गांव के लोग इसी मार्ग से आवाजाही कर रहे हैं। उपर से मलबा व बोल्डरों के गिरने का क्रम जारी है। वीरान पड़ी यह घाटी आज अपने अस्तित्व को तलाश रही हैं। यहां से विद्यापीठ होते हुये तबाह सड़को की स्थिति देखकर हर कोई दुखी है। कुल मिलाकर चिलौण्ड चैमासी से लेकर कोटमा कालीमठ आदि दर्जनों गांवो में कैसे लोग रह रहे हैं। इसको बयां करना बड़ा कठिन है।

जायें तो जायें कहाँ. राजेन्द्र जोशी
(प्रवक्ता से साभार)

घर-बार बर्बाद हो गया, आंखों में आँसू है और सामने अंधेरा। रोज कोई नेता आता है, सपने दिखाने के लिए। बारिश से रात को नींद भी नहीं आ रही है। 15 जून के बाद की रातों की याद ने नींद भी छीन ली है। हर बारिश की बूँद की आवाज से खौफनाक अंदेशा इनके चैन को छीन कर ले गया। कमोवेश यह स्थिति उत्तराखण्ड राज्य के आपदा प्रभावित सभी इलाकों की है। सोबला, न्यू कन्च्यौती, खिम के 175 से अधिक परिवारों को जान बच जाने की थोड़ी खुशी तो है। कन्च्यौती में दो लोगों की जान इस आपदा से गयी। उनकी यादें अपने जीवन के बच जाने के बीच इन परिवारों के चेहरों पर यह परेशानी साफ तौर पर देखी जा रही है कि अब कैसे उनका कुनबा बसेगा। धारचूला व मुनस्यारी क्षेत्र में आयी आपदा में ये चार गाँव हैं, जो अब इतिहास में दफन हो चुके हैं। इन गाँवों की वो खुशहाली अब बीते दिनों की याद बनकर रह गयी है। राजकीय इण्टर कॉलेज धारचूला के उन कमरों में जहाँ कभी बच्चे पढ़ते थे आज इनकी शरण स्थली बन गयी है। इन लोगों को इस बात का डर है कि डीडीहाट के हुड़की, धारचूला के बरम तथा मुनस्यारी के ला, झेकला, सैणराँथी के आपदा पीड़ितों के साथ सरकार ने जो अन्याय किया है, कहीं उनके साथ भी ऐसा न हो। आज उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती है कि कैसे सितम्बर तक का समय गुजरे।
धारचूला के सामाजिक कार्यकर्ता केशर सिंह धामी के साथ जैसे ही राजकीय इण्टर कॉलेज में पहुँचे तो वहाँ ठहरे आपदा पीड़ित एक-एक करके बाहर निकलने लगे। उनकी आँखें अब इन्तजार करते-करते थक चुकी हैं। पैरों में अब खड़े होने की ताकत भी नहीं बची है। एक सप्ताह से इस शरण स्थल में रहने वाले इन 175 परिवारों के सैकड़ों आपदा पीड़ित 15 दिनों से कपड़े तक नहीं बदल पाये हैं। इन गाँवों से इन्हें हैली में लाया गया। घर के साथ ही इनके तन के कपड़े भी धौलीगंगा में समा चुके हैं। विजय बहुगुणा ने इन परिवारों को इनके गाँवों से यहां आमन्त्रण देकर बुला तो लिया लेकिन इन्हें किस बात की आवश्यकता होगी, इसका कोई ध्यान नहीं दिया गया। इस टीम के सदस्य किसान महासभा के नेता सुरेन्द्र बृजवाल, पिथौरागढ़ छात्र संघ के अध्यक्ष हेमन्त खाती और जगत मर्तोलिया ने इन परिवारों से अलग-अलग बात की। बात करते-करते इनकी आवाज रूक जा रही है। गला भर आ रहा है। आँखों में आँसुओं की बूँदें और आँसू से चपचपाती पलकें इनके दर्दों को स्वयं ही बता रही हैं। धारचूला क्षेत्र में कीड़ा जड़ी को जमा करना भी एवरेस्ट चढ़ने से अधिक चुनौती भरा है। अपनी जान पर खेल कर इन्होंने धन इकट्ठा किया और उससे घर बनाया। जो अब धौली का निवाला बन गया है। इनके घर अब दुबारा बिछड़े गाँव में नहीं बन सकते। अब इन्हें एक नया गाँव और नया आशियाना चाहिए। तन में केवल एक कपड़ा लेकर धारचूला पहुँचने के बाद इस शहर में में पहुँच गये हैं। शहर वालों के साथ चलने की हिम्मत इनके पास नहीं है। जिनके पास खाने के लिए अपने बर्तन न हों, चटाई में लेटने के लिए इन्हें यहाँ छोड़ दिया गया है। इनके बचे कुचे जानवर अभी गाँव में हैं, जो इन्हें ढूँढ रहे होंगे। यह चिन्ता भी इनके जुबाँ पर है। धारचूला की गर्मी और मच्छरों का प्रकोप इन्हें धौलीगंगा के द्वारा दिये गये गम की तरह लग रहा है। अभी तक तो ये मात्र एक चटाई के सहारे सीलन भरे कमरे में लेटे हुए थे। बाहर हो रही बारिश की बूँदें छतों से टपक कर इनके कमरों में इनकी शान्ति को भंग कर रही है और साथ ही इनके चैन को इनसे छीनती जा रही है। एक सप्ताह बाद भाकपा (माले) के हस्तक्षेप के चलते तहसील प्रशासन द्वारा 50 गद्दे यहाँ बांटे गये हैं। बताये गये कि 150 गद्दे और बन रहे हैं। इससे इनके बिस्तरों की समस्या तो पूरी नहीं होगी लेकिन कुछ आराम तो मिलेगा। इण्टर कॉलेज के कमरे 15 दिनों से बन्द थे। कमरों में सीलन की बदबू अलग है और पानी रिसने के कारण पूरा कमरा निमोनिया और टाइफाइड जैसी कई बीमारियों को न्यौता दे रही है। खिड़कियों में जालियां नहीं हैं। मच्छरों के अलावा कई प्रकार के कीट कमरों में घुस कर इन परिवारों को परेशान कर रहे हैं। पहले से ही घर और गाँव खोने से परेशान इन परिवारों को कीट मच्छर तो नहीं पहचानते लेकिन सरकार तो जानती थी, उसके बाद भी उसने क्यों बन्दोबस्त नहीं किया। आपदा राहत शिविर का नाम इसे दिया गया। सीधे तौर पर कह सकते हैं यह राहत नहीं आफत शिविर है। एक आफत से बचकर यहाँ पहुँचे इन पीड़ितों को और इन आफतों से गुजरना पड़ रहा है। एक कमरे में चार से छः परिवारों को जानवरों की तरह ठूँसा गया है। स्कूल के कुर्सी व टेबल ही इनके सहारे हैं। धारचूला के कई स्कूली बच्चों ने इस सवाल को भी उठाना शुरू कर दिया है कि अब वे कहाँ पढ़ेंगे। इन गाँवों के नेता और प्रशासनिक अधिकारी आपदा पीड़ितों के जख्मों पर मरहम लगाने की जगह उनको डांटते फिर रहे हैं।‘‘अरे हमने कमरा तो दे दिया, अब हम क्या करें? इतना बहुत है’’ इन बातों से नाराज आपदा पीड़ित परिवारों के सदस्यों का कहना है कि हमें हमारे गाँवों से क्यों यहाँ लाया गया। स्कूल जाने वाले बच्चे इस स्कूल के आंगन में खेल रहे हैं। उनका बस्ता धौली गंगा में बह गया है। उन्हें आज भी पहाड़े व गिनती और कुछ कवितायें याद हैं। गणित के सवाल भी उनके दिमाग में हैं लेकिन उनको उकेरने के लिए उनके पास कॉपी पेन्सिल नहीं है। बच्चों का कहना था कि हमारा स्कूल भी तो बह गया है। अब हम कहाँ पढ़ने को जायेंगे। इन बच्चों की तोतली आवाज से दिल को चीरने वाली जो पुकार निकल रही है। उसे यहाँ बार-बार आने वाले विधायक, सांसद, मंत्री और प्रशासनिक अमले के अधिकारी सुन तक नहीं पा रहे हैं। कन्च्यौती के मोहन सिंह का कहना है कि तीन महीने कैसे गुजरें? यह हमारी पहली समस्या है। स्कूल में ज्यादा समय नहीं रह सकते। आपदा मंत्री टिन शैड बनाने की बात कह गये हैं। इसे बनने में तो महीने बीत जायेंगे। जब गद्दे व कम्बल देने में इतने दिन बीत गये। खिम की सरस्वती बिष्ट का कहना है कि हमारे खेत बह गये। जानवर भी साथ में धौली में बह गये। हम क्या करें। कैसे अपनी जिन्दगी गुजारें। इस जिन्दगी को गुजारने के लिए कौन हमारी मदद करेगा। न्यू ग्राम की नीरू देवी तो काफी दुःखी है। कहती है कि ‘‘कभी न सोचा था कि कभी अपना गाँव छोड़ेगे। अब हमें कैसे एक गाँव मिलेगा। जहाँ हम सब महिलायें इस त्रासदी को आपस में एक दूसरे में बांट सकेंगी।’’ सोबला के नेत्र सिंह का कहना है कि गाँव तो गया। अब नहीं लगता है कि दोबारा हमारा कोई गाँव होगा। सरकारें तो झूठ बोलती हैं। झूठ से कुछ दिनों तक सन्तोष मिल सकता है लेकिन आगे नहीं। यह बात तो केवल चार उन गाँवों की है। जो अपना सब कुछ धौलीगंगा को सौंपकर खाली हाथ इण्टर कॉलेज की शरण स्थली में बैठकर टकटकी लगा बैठे हैं कि अब क्या होगा?Image

उन आत्माओं के लिये . चिन्मय सायर
महाविनाश के बाद-
दहशत में हैं वे
जो, जिन्दा हैंImage
रो और रूला रहे हैं वे
जो, जिन्दा हैं
खुश और खुशनसीब हैं वे
जो, जिन्दा हैं
और,
काल का क्रूर तांडव
जिन पंचभूत शरीरों से
झंझोड़ ले गया आत्मायें
उन आत्मीयों के लिये
संवेदनायें लिये
नतमस्तक हैं
हम सब निःसहाय, विनम्र
जो जिन्दा हैं…
हम सब जानते हैं
काल के प्रवाह को
और उसकी क्रूर प्रवंचना को
फिर भी,
एक अकल्पनीय सुख की
मरीचिका,
हमें टांकती-तड़फाती रहती है
मोह-माया के बस में
काल की मनसा
और उसकी विप्रलंभी हंसी
जीवन भर नहीं समझ पाते हैं हम
खूबसूरत-मुग्धी पुष्पों का हार
पहनाते हुये भी
महाकाल के गले में
पुष्प कहते नहीं हैं/ वे,
पंचमाभूतों से
परिपूर्ण कहां हैं?

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