ज्योतिर्मठ तक पहुंचे अपराधी …..शाक्त ध्यानी
पिछले दिनों जिस तरह बद्रीशधाम के रावल का नाम छेड़खानी प्रकरण में उछाला गया, वह हतप्रभ करने वाला है। बद्रीनाथ से गर्भनाल जुड़ी हाने के कारण विशेष रूप से उत्तराखण्ड का पुरोहित समाज इस घटना से आहत है। यह मामला एक पुजारी की गरिमा से नहीं अपितु हिन्दुओं के सर्वाधिक प्रतिष्ठित धाम की शुचिता से भी जुड़ा है। कोयला घोटाले के प्रकरण से जुड़ी बदनाम महिला नीरा राडिया की भूमिका जिस ढ़ंग से इस प्रकरण से जुड़ रही है, उस कारण इस आरोप में एक सुनियोजित षडयंत्र की ‘बू’ आ रही है। पंडा पंचायत के सदस्य मुकेश अल्खनियां से जब इस विषय में बात हुई तो उन्होंने भी किसी षडयंत्र की आशंका से इनकार नहीं किया। आरोपी रावल, जो कि मुख्य पुजारी हैं, को अल्खनियां ने एक बहुत ही सज्जन और बेहद शर्मीला इंसान बताया…उन्होंने आश्चर्य जताया कि जिस व्यक्ति को कभी किसी ने गर्दन ऊँची करके बातचीत करते हुये भी न देखा हो, वह सिगरेट-शराब और लड़की को छेड़ने की हरकत करेगा? यदि उसे ऐसा करना भी होता तो पचास लाख सालाना कमाने वाला आदमी कहीं भी जाकर ऐसा कर सकता था। अल्खनियां ने आश्चर्य व्यक्त किया कि ऐसे सन्त स्वभाव का आदमी अपनी जान-पहचान वाले श्रद्धालुओं के बीच रहकर, देश की राजधानी में एक होटल में ठहरेगा और पन्द्रह -बीस केन बीयर की उंडेलकर होटल के अहाते में शराबियों की तरह लड़खड़ाता मिलेगा? सिगरेट की डिब्बियां फूंक-फूंक कर कमरा भर देगा? और फिर नशे मे धुत होकर एक गर्भवती महिला को रिसीव करने होटल के फाटक तक आयेगा? पर दिल्ली पुलिस को महिला की स्टोरी में कोई खोट नजर नहीं आता। रावल, दिल्ली के जिस होटल में टिके हुये थे, उसे नीरा राडिया ने बुक करवाया था। राडिया, तथाकथित पीड़िता के बद्रीनाथ स्थित होटल की नियमित अतिथि हुआ करती थीं। तो क्या रावल को फंसाने का कार्यक्रम बद्रीनाथ में ही बनाया गया। हो सकता है कि रावल के पानी में शराब मिलाकर धोखे से उन्हें पिलाई गई हो ताकि आरोप को मेडिकल रिपोर्ट में सही साबित किया जा सके। सिगरेट और बीयर के केन कमरे में छुपाना इतना मुश्किल भी नहीं है। जिस देश में संघ जैसे राष्ट्रभक्त संगठन के मुखिया को काल्पनिक साक्ष्यों के आधार पर ही मीडिया में उछाला जा सकता है, वहां एक भोले सन्त को लपेटना कौन सा मुश्किल कार्य है। पर प्रश्न ये भी है कि रावल उक्त महिला और राडिया को कैसे जानते थे? सूत्र कहते हैं कि यह पैसों के लेनदेन का मामला भी हो सकता है। ज्ञात हो कि रावल की सालाना आय करीब पचास लाख रूपया है, इसके अतिरिक्त श्रद्धालुओं द्वारा दी गई व्यक्तिगत भेंट भी है…स्थानीय लोगों को शक है कि यह महिला जिसका बद्रीनाथ में होटल है, रावल के संपर्क में थी, नीरा राडिया जैसी आर्थिक अपराधी की सखि होने के कारण लोगों को शक है कि रावल के पैसों का इनके द्वारा कहीं निवेश किया गया और पैसा वापस मांगने पर इन्होंने उन्हें ही फंसा दिया। इस कोण से भी मामले की जांच की जानी चाहिये।
सच जो भी हो, आदि गुरू शंकर द्वारा स्थापित इस धार्मिक स्थली की गरिमा को ठेस पहुंचाई गई है। बद्रीनाथ की धार्मिक व्यवस्था देखने के लिये शासन की ओर से ‘बद्री-केदार मंदिर समिति’ का गठन किया गया है। जिसके अध्यक्ष आदि धार्मिक पृष्ठभूमि के न होने के कारण धाम के यात्रियों को पर्यटक की तरह ही देखते रहे हैं और खाना-सोना-लादना ही उनकी चिन्तायें रहती हैं। देवप्रयाग के पंडे और भगवान का भोग बनाने वाले पुरोहितों को इस व्यवस्था में शामिल नहीं किया गया है। इस कारण मंदिर से जुड़ी धार्मिक व्यवस्थाओं में यह शिथिलता आई है। मंदिर के रावल को शीतकाल में जोशीमठ अपनी पीठ में ही रहना चाहिये, पर पुरोहितों का हस्तक्षेप न होने के कारण यह नैतिक दवाब घटता चला गया। शासन को पता ही नहीं होता कि मंदिर का मुख्य पुजारी कहां है और किस कार्य में लिप्त है। भगवान बद्रीविशाल और केदार, पंडों का प्रत्यक्ष अन्नदाता रहा है। टिहरी नरेश की बनाई व्यवस्था के अनुसार यात्रियों की समुचित आवास-दर्शनादि की व्यवस्था करना और शीतकाल में देश भर में पर्यटन करके यात्रियों को इन धामों में आने के लिये प्रेरित करना, सदियों से पंडो का कार्य रहा है…जब से पंडों और टिहरी नरेश को इन धामों से विलग किया गया है, तब से एक नये तरह की वीआईपी भक्ति इन मंदिरों में देखी जा रही है। पंडे असहाय यह सब देखते हैं, सरकारी गुंडों का मंदिर की समस्त आय पर कब्जा है…इसमें कितनी हेर-फेर की जाती है, कौन जाने…पिछले एक दशक से हमारे धार्मिक प्रतिष्ठानों के विरूद्ध लांछनों का जो एक सीरियल चलाया जा रहा है, कहीं रावल प्रकरण उसी का एक एपीसोड तो नहीं? पर बद्रीनाथ की कृपा जिस पंडा समाज की धमनी में रक्त बनकर दौड़ रही है, वह इस एपिसोड से स्तब्ध है।

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