राजनीति का जौहरी

 

मोदी का विजय रथ दिग्विजय पर है। इसका श्रेय भाजपा के मातृ संगठन संघ को तो है पर मोदी के अपने व्यक्तित्व का इसमें बहुत बड़ा योगदान है। मोदी को विपक्ष और वामपंथी जितना गरिया रहे हैं, उतना ही मोदी का मुकुट चमक रहा है। सोशल मीडिया में मोदी के आलोचक भी वही गलती कर रहे हैं जो कांग्रेस ने की थी। आप बिना कारण एक नेता को गरियायेंगे, बिना प्रमाण उस पर भ्रष्टाचार का आरोप लगायेंगे, तो भारत का लोकतंत्र मोदी को त्रिपुरा जैसा ही पुरस्कार देगा। कुछ लोग मोदी जी को श्रेष्ठ वक्ता मानते हैं, पर मुझे लगता है कि गुजराती होने के कारण उनके भाषणों में बाजपेयी जैसा ओज नहीं है, पर यह भी सही है कि बाजपेयी जी यदि मध्यम वर्ग के पसन्दीदा नेता थे तो मोदी निम्न वर्ग के श्रोताओं की भीड़ इकट्ठी करने में माहिर हैं। वैसे मोदी जी में जो सबसे बड़ा गुण है, वह है उनकी पारखी

नजर। वे राजनीति के बाजार के सबसे बड़े जौहरी है। राजनीति में अपने आसपास की भीड़ में से नगीनों को चुनना और उन्हें उस जगह बिठाना जहां वे सबसे ज्यादा कमाल कर सकते हैं, ऐसा आज तक मैंने क्षेत्रीय या राष्ट्रीय स्तर पर किसी नेता में नहीं देखा। अमित शाह उनके साथ सबसे लम्बे समय से बैटिंग कर रहे हैं, और अमित शाह की संगठनात्मक क्षमताओं का उपयोग कर मोदी ने आज भाजपा के इतना सशक्त दल बना दिया है। और यह दल सपा, बसपा, शिवसेना की तरह हवा में नहीं है, उसके पास जनता के बीच काम करने वाले समर्पित कार्यकर्ताओं की सेना है। अमित शाह के अतिरिक्त मोदी के अनेक सिपहसालार हैं जो अनजाने होकर भी महत्वपूर्ण पदों पर बैठकर शानदार काम कर रहे हैं। मोदी जी अपने वैराग्य के दिनों में उत्तराखण्ड में रहे. उन्होंने यहां के लोगों में ईमानदारी और देशप्रेम को जो अतिरिक्त उत्साह देखा उसका ही परिणाम है कि आज देश के करीब दर्जन भर संगठनों, संस्थानों के लीडर पहाड़ से हैं। पहाड़ के लोग शुरू से ही अपनी ईमानदारी के लिये जाने जाते रहे हैं। और शायद यही कारण था कि उन्हें मैदानों के लोग अपनी दुकानों, कोठियों, में नौकरी देते थे…मूर्ख लोग माणिक्य को गधे के गले में ही बांधते हैं. इसीलिये किसी ने भी पहाड़ियों की ईमानदारी का सदपयोग नहीं किया. यही कारण था कि स्वयं पहाड़ के लोगों ने अपनी सत्यनिष्ठा, अपनी पहचान को ही गाली समझ लिया और आज पहाड़ के गांवों में तक ईमानदारी एक गाली मानी जाने लगी है। पर मोदी को मैं एक पहाड़ी होने के नाते धन्यवाद देना चाहता हूं कि उन्होंने हीरे को सही आभूषण में फिट किया है, हमारी ईमानदारी को पुरस्कृत कर पहाड़ को फिर से उसके मूल स्वभाव में आने के लिये प्रेरित किया है। मोदी ने ऐसा देश के हर क्षेत्र के साथ किया है, हर मुल्क के साथ किया है, एक जननेता ऐसा ही करता है। वे चाणक्य के बाद इस देश के सबसे चतुर, सबसे समझदार और चरित्रवान नेता हैं। मोदी ने वामपंथियों के तंबू उखाड़ दिये हैं, इस कारण कांग्रेस के साथ मिलकर कुछ चैनल, कुछ कलमध्वज, कुछ दलाल, कुछ मुल्क उनके पीछे तलवार ताने खड़े हैं..ये लोग वही गलती कर रहे हैं जो उन्होंने गुजरात में की थी। वे जितना मोदी को बदनाम करेंगे, उतना वे अपना ही राजनीतिक नुकसान कर रहे हैं। पर ये भी सच है कि मोदी सरकार भी अनेक राजनीतिक भूलें कर रही है। यदि कुछ नेताओं को केन्द्र में उनके अतीत के कारण जगह नहीं मिली तो फिर उत्तराखण्ड में कांग्रेस छोड़ कर आये कुछ भ्रष्ट नेताओं को उच्चासनों पर भी नहीं बैठाया जाना चाहिये था, प्रदेश की जनता ने बीजेपी को जो प्रचंड बहुमत दिया था, वह बहुगुणा और हरक रावत जैसे नेताओं के कारण नहीं दिया था। ऐसे नेताओं के कारण राजनीति के स्वच्छता आंदोलन का मजाक ही बनता है। अभी ताजा उदाहरण उ0प्र0 के नरेश अग्रवाल का है जो मुलायम गैंग के सबसे मुखर बतौलेबाज रहे हैं, हिन्दु प्रतीकों को गरियाने वाले नेताओं में वे शीर्ष पर थे, उन्हें टिकट नहीं मिला तो भाजपा में आ गये। अब इसका आम जनता क्या अर्थ निकाले। आप कहेंगे कि हम सिद्धान्तों वाली पार्टी हैं और जनता मान लेगी? इसका जवाब मोदी और अमित शाह को बहुत जल्दी देना पड़ेगा। अभी प्रदेश के नेतृत्व को सत्ता मिले साल भर हुआ है पर ऐसा कोई परिवर्तन राजनीति के गलियारों में नहीं दिखाई देता जिससे लगे कि कांग्रेस सत्ता से बाहर हो चुकी है। कांग्रेस मुक्त भारत का सपना कांग्रेसियों को घराती बनाने से पूरा नहीं होगा। कांग्रेस मुक्त भारत का यही अर्थ होना चाहिये कि राजनीति के अस्त्र बदल गये हैं। कार्यप्रणाली दोषमुक्त न भी हो पर सचिवालय के आंगन में दस प्रतिशत तो उजाला हो! यदि फाइलों का मटमैलापन वैसा ही होगा तो मोदी के नारों की प्रदेश में क्या प्रासंगिकता है? स्वच्छता अभियान की पहली आवश्यकता राजनीति में है। क्योंकि संसद और विधान सभायें अपने गलियारों को साफ नहीं करेंगे तो साफ सड़कों का स्वास्थ्य के अलावा कोई विशेष महत्व नहीं है। इसलिये बीजेपी का कांग्रेसीकरण करना कहीं आत्मघाती साबित न हो, ये वही चुहे हैं जो जहाज डूबने पर सबसे पहले भागते हैं, ऐसे लोगों से किसी भी राजनीतिक दल की उम्र नहीं बढ़ती बल्कि अनेक तरह की राजनीतिक बीमारियां उल्टे भाजपा को भी लगीं तो संघ जैसे संगठन का अब तक किया, सब धरा रह जायेगा। चुनाव जीतना प्रत्येक दल की रणनीति होती है पर लम्बी जीत हासिल करने के लिये समाज के दूरगामी हितों को देखना वाला दल ही अंतिम विजेता बनेगा।

Advertisements

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s