बसन्त भी अब राज्यपाल जैसा हो गया है..जब आता है तो कमांडो और कारों के काफिले के साथ आता है। प्रदेश स्तर पर सबसे पहले राजभवनों मंे दर्शन देता है और राष्ट्रीय स्तर पर..बोले तो…मुगल गार्डन में किसी ऐयाश नबाव की तरह साल भर ही लेटा रहता है। राजभवनों में पुष्प-प्रदशर्नियां लगती हंै और विस्मृत भारतीय अपने ऋतुराज को गमलों में रोपकर लाइनों में लग जाते हैं.ं..यह राज्य का भेजा है…राज्य ऋतुओं को भी गेंहू की तरह ‘क्यू’ में बाँटता है…राज्य का धर्मनिरपेक्ष बसन्त गमलों में सजता है और फिर मीडिया द्वारा कागज की सुलभ प्लेटों में घर-घर परोसा जाता है। ऋतुराज को भी भाई लोगों ने मूसा बना डाला है…माउस पर रखी हमारी उंगली बारह महीने कम्प्यूटर पर ऐसे-ऐसे दृश्य उपस्थित कर सकती है कि कालीदास से लेकर विद्यानिवास मिश्र तक भारतीय कवियों, मर्मज्ञों की लेखनी का इन्द्रधनुषी रंग भी इस डेस्कटाॅप के सामने फीका पड़ जाय। कई लोग फूलों की इन रंग-बिरंगी पंखुडि़यों को बसन्त समझकर अपनी कोठी में माली द्वारा आयोजित बसन्त का साल भर आनंद लेते हैं, ऐसा पड़ोसी को लगता है…जो महंगे विदेशी फूलों को देखकर पड़ोसी की आय के स्रोत का अनुमान लगाता है…फास्टफूड वालों का बसन्त इस तरह गमलों में अनुवादित होता है…यह बसंत का अभिजात्य रूप है…यह ‘हाईहील’ वाला एलीट बसन्त विदेशी गाडि़यों की तर्ज पर गमलों से थोड़ा नीचे उतरकर इंच-इंच नापी गई क्यारियों में एटीकेट के साथ हँसता बोलता है…/ कैमरे और मीडिया के ठग लोग शहरों की सीमाओं मंे सूंघते हुये बसन्त ढूंढते हैं…कुछ नहीं तो सरसों के खेतों की पीली-साड़ी को खींच कर बसन्त को ही नग्न कर लेते हैं…यह रोज बिकता हुआ बसन्त का गर्म समोसा है…शहर का मध्यम वर्ग इसी कैमरे की आंख से गुनगुना कर अपने आस-पास की दृश्यावलियों से बसन्त के बारे में पूछता है…किशोर-किशोरियों का बसन्त ‘डियो’ और ‘बुक’े जैसे कृत्रिम उत्तेजकों में लुढ़कता रहता है…निव्र्याज खिलता अपना बसन्त लगता है जैसे कहीं दूर भाग गया है…उस जगह जहां कि आदमी कभी देखता ही नहीं…यह बहिर्मुखी चिंतन का युग है…जोगी-जोगने तक नेताओं को अपने दायें-बायें खड़े कर धर्म को रेखांकित समझ रहे हैं…तब हृदय में कौन झांके…उस अन्तर्जगत में देखने की जुगत कौन करेगा, जहां बसंत प्रत्येक वर्ष आकर ठाठ से ठहरता है…व्यक्ति की अन्तर्चेतना में करवट लेकर प्रकृति के महावर्तुल का स्मरण कराता है।
पुष्प तो बसंत का मुखड़ा है…प्रकृति के रेचन का उत्तर उत्पाद है, पुष्पों के प्रकट होने से पूर्व, विद्यानिवास मिश्र के शब्दों में कहें…तो एक उद्भिन्नता मन में प्रवेश करती है। रातें अपनी चादर सिकोड़ती हैं, दिन लम्बाई में लेटने लगते हैं…एक हूक, एक उदासी सी मन को घेरती है…यह बसन्त का श्रीचरण जीवन का पुराना सब कुछ तोड़ता है…बीज की तरह, शरीर के पुराण को टूटते देख ही एक भय, एक खिन्नता मन में इन आरम्भिक दिनों में छाती है/ बीज अपने शरीर से तादात्म्य बना लेता है…परन्तु जैसे ही बसन्त का एसएमएस पहुंचता है…अन्दर का अंकुर बीज के शेष शरीर से नाता तोड़ता है…बीज का खोल सड़ता-टूटता है…नव निर्माण के लिये पुराने शरीर को विलीन होना ही होता है…मनुष्य की चेतना महाप्रकृति के इस ध्वंश का अनुभव बसन्त के आरम्भ में करती है…इसी कारण मनुष्य के शरीर में भी जितना विकार है उसे प्रकृति बाहर फेंकने का आदेश देती है…चिकित्सकों की भाषा में यह उभार बसन्त में होता है इसीलिये स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से ऋतुराज भयंकर भी माना गया है…शरीर ही नहीं, इस विध्वंश, टूटन की इस प्रक्रिया का स्पर्श करने के कारण मन भी उद्भिन्न होता है…वर्ष भर का संचित आग्रह बसन्त मंे अग्नि को होम कर देना चाहिये…होलिका-दहन बसन्त के इसी संदेश का प्रतीक है…बीज के खोल की तरह यदि हम पुराने को अग्नि में होम नहीं करेंगे तो भविष्य का अंकुरण संभव नहीं होगा… अंकुरण बसन्त की पहली ताल है…इसी को गढ़वाली बोली में ‘‘मौल्यार’’ अर्थात् ठंूठ से कोपलों का फूटना/ नवांकुरों का धरती की पर्त को हरी चादर सौंपने को कहते हैं…विध्वंश की पीड़ा के बाद यही अंकुरण, उल्लास, उत्साह का संचार करता है…समस्त चराचर जगत इस कारण बसन्त के आगमन पर कुलांचे मारता है…इसी कारण बसन्त के दिनों में प्रकृति के नवरस प्रकट होते हैं…ऋतुचक्र का जोड़ होने के कारण भी ये अलसाये दिन मन के सभी भावों-रसों की यात्रा करवाते हैं…दुख, आलस्य, उल्लास कौन सा भाव ऐसा है जो आपको छेड़ न जाता हा,े गुदगुदा न जाता हो…पर कहते है ना…अन्त भला तो सब भला…बसन्त जाते हुये हमें खाली हाथ विदा नहीं करता…वह रंग-बिरंगे ‘महाबुके’ रखकर…बोले तो..‘बाय-बाय’ करता है…होली, बसन्त की विदाई का ही तो उत्सव है…उस समय के घाघ समाजशास्त्रियों ने फूलों को नहीं छेड़ा…उन्हें खिलने दिया…परन्तु बसन्त का संदेश समझकर उसके रंग अपने जीवन में उतारे, पिचकारियों का त्योहार रच डाला…हमने भी बसन्त को खाली हाथ नहीं भेजा, हमने उसके भी कपड़े रंग-बिरंगे बना दिये…ये कपड़े फाड़ने वाला सेकुलर दर्शन बाद में रचा गया है/ वे लोग जो प्रकृति की बोली नहीं जानते उन्होंनंे भारत जैसी…बोले तो…सेकुलर स्टेट में इधर अपनी नई भाषा विकसित की है। परन्तु अपनी राजनीतिक बीथिकाओं में बसन्त का जो राजनीतिकरण किया जा रहा है, वह ठीक नहीं है….जिस तरह कांग्रेसी अपने किसी नेता को ठिकाने लगाने के लिये उसे राज्यपाल बना देते हैं…तो राज्यपाल हाईकमान को तो कुछ बोल नहीं सकते, वे इसका बदला बसन्त जैसी बिन्दास ऋतु से लेकर उसके मूलभाव को ही ठिकाने लगाने के चक्कर में हैं। चमचे सुनें..! बसन्त गमलों में उगी यूरिया पोषी, खमीरे की तरह फूली गुलदावरी नहीं है…वह तो उस वट वृक्ष जैसे विराट भारतीय समाज का सामुहिक उल्लास है…पूरे पहाड़ की ओढ़नी बनकर दहकते बुरांश को गमले के फूल देखने वाली राज्यभवन की आंखे कैसे देख पायेंगी? उसे देखने के लिये अन्तर्चक्षु चाहिये…देखना…कि बिना राजभवन में आयोजित पुष्प-प्रदर्शिनियों के आने वाला बसन्त कितना विराट, कितना रंग-बिरंगा, सम्मोहक लगता है। 

नमस्तस्यै नमो नमः—-शाक्त ध्यानी
तारामण्डलों के उस पार फैले खगोल के महाविस्तार को देख, हमारे मनीषियों ने अन्तर्यात्रायें कर, उस महाचेतना को ही आद्यशक्ति कहा होगा। चेतना के विभिन्न स्तरों से निकला यह धार्मिक आविष्कार, भारतीय अध्यात्म का चिंतन बीज है… वैचारिक ऊर्जा की उसी पुरातन मिट्टी से हमारी संस्कृति के वटवृक्ष का निर्माण हुआ है।
पितृ श्राद्ध समाप्त होते ही आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से शारदीय नवरात्र आरम्भ हो जाते हैं। ‘पितृ श्राद्ध ’ भूत हो चुके अदृश्य जीवन को हमारा प्रणाम है, और नवरात्रि की ‘घट-स्थापना’ एवं ‘जौ’ की हरियाली, ऋतुगर्भा दिनों की प्रतीक हैं। ऋतुएं वर्ष में दो बार ऋतुगर्भा होती हैं। बसन्त और शरद ऋतुओं के इन नौ दिनों को ऋतुगर्भा माना गया है। प्रकृति के इसी नौ दिवसीय रचनाधर्म को ‘नवरात्र ’ कहा जाता है… जीवन के वर्तुल को परिभाषित करने का यह भारतीय ढंग है। शरद ऋतु का यह संधिकाल, शरीर में हलचल पैदा करता है…शरीर के विकार उभरने लगते हैं…आंतरिक रस-रसायनों और मनोवेगों का प्रकृति के साथ संघर्ष होता है…प्रकृति से सामन्जस्य बैठाने का यह संघर्ष, शरद में ही होता है। इसीलिए जहाँ बच्चों की उम्र की तुलना ‘वसन्त’ से होती है, वहीं वयस्कों के लिए ‘सौ शरदों’ की कामना की गयी है।
नवरात्रों के अनुष्ठान और साधना के प्रावधान अकारण नहीं हंै। शारीरिक वेग और व्याधियाँ, व्रत साधना से नियन्त्रिात हों…धार्मिक चित्त वृत्ति का रंग, आहार-व्यवहार का परिमार्जन करे तो जीवन स्वयं ही त्यौहार बन जाता है…जैसे कि रजोधर्म के कारण ऋतुमती स्त्राी, गर्भधारण के योग्य बनती है…‘रज’ रचना का केन्द्र है, … सृजन के इस महायज्ञ में समिधा बनती स्त्राी को हमारे मनीषियों ने उच्चासन दिया है…महाप्रकृति के समस्त रचनाधर्म को गर्भ देने वाली वह महाशक्ति, महामाया, स्त्राी का वह विराट रूप, वह जगद्जननी ही नवरात्रों की आराध्य देवी है…..‘क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा’ इन पांच तत्वों के प्रतीक सुगंध्,ि जलाभिषेक, दीप, धूप, आदि देवी को अर्पित किये जाते हैं। और पूजा के अन्त में नैवेद्य के निवेदन से प्रकृति के समस्त तत्वों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित की जाती है… प्रकृति के विश्लेषण का यह लोक-दृष्टान्त, ये कर्मकान्ड, जीवन में संयम और परिमार्जन लाते हैं….ऋत् के अमृत से आनंदित समाज, साधना से सधता है, रचनाशीलता के आनंद से जुड़ता है।
शरदऋतु में गेहूं, जौ, चना बोया जाता है, वृक्षारोपण होता है…उद्योगों से निबटने के पश्चात ही कार्तिक के पावन-स्नानों की झड़ी लग जाती है/ मालवा और दक्षिण भारत में तो कार्तिक-शुक्ल की प्रतिपदा से ही नववर्ष का आरंभ माना जाता है, वहीं दीपावली में बही-खाते बदलकर, व्यापारी, नव-वर्ष की शुरूआत करते हैं…काल-गणना की यह भारतीय समझ अद्भुत है…बिना कलेन्डर के हजारों वर्षाें से अनपढ़ लोग भी प्रकृति और कालचक्र से बतियाते हैं…नदियों के किनारे होने वाले मंगल-स्नान, समय की वे भारतीय-सुईयां हैं, जिनकी टिक-टिक को हमारे लोग वर्षो से समझते रहे हैं… हमारे ये धार्मिक-स्नान सामाजिक मिलन के केन्द्र हैं…काया को क्षणभंगुर मानने वाला भारतीय-समाज नदियों के किनारे मात्रा शरीर धोने नहीं आता, वह पानी में डुबकी लगाकर उन पवित्रा जलतरंगों में जातीय-स्मृति के उस आरोह-अवरोह को सुनने भी आता है, जो मन के तारों को प्रतिवर्ष कसकर प्राणों को सुरीला ‘वाद्य’ बनाता है।
नवरात्रों में ‘देवीपूजा’ को रामलीला और कृष्ण की महारास लीला से रेखांकित करना, हम जीवंत-भारतीयों की उत्सव-प्रियता का प्रमाण है…सूर्य की तिरछी होती किरणें, अपनी गुलाबी ठंड से धमनियों को गर्माती हैं, यौवन कुलांचे मारने लगता है… वस्त्रों की भाषा बदलती है…रामलीला की चैपाइयां, हारमोनियम की धुनें मन में अलग सी उदासी भरती है…शरद-ज्योत्सना की ठंडी-आग, यौवन के पृष्ठ जलाने लगती है…कृष्ण का महारास ऋतु-सम्पादित समाचार-पत्रा की तरह प्रत्येक व्यक्ति की दिनचर्या में हस्तक्षेप करने लगता है, नुकीला होता शीत, जीवन को खटखटाता है, शरद शरीर को मांजता है…इसीलिये वयस्क जन, खीर के कटोरे चांदनी में रख उस ऋतु-अमृत से सौ-शरदों को देखने की कामना करते हैं…शरद से लेकर बसन्त के धमाल तक के ऋतुचक्र को हमारे देश मेें धार्मिक-पुस्तक की तरह पढ़ा जाता है। भौगोलिक-परिवर्तनों को पर्व-त्योहारों का नाम देकर हम भारतीय अन्तरिक्ष में बैठे उस अध्यक्ष की सत्ता को ही प्रणाम करते हंै।
अष्टमी पूजन के उपरान्त दशमी तक जब कोई पुरोहित आपको जौ की हरियाल देगा…तो ध्यान रहे, यह रजोधर्मा जगद्जननी का आशीष है। ऋतुगर्भा हुयी प्रकृति का गुणसूत्र है…ये मामूली से दिखने वाले कर्मकान्ड उस गूढ़-दर्शन के संवाहक हैं जो प्रतिवर्ष प्रकृति की तरह हमारे समाज को भी नूतन करते हैं…इसीलिये कृतार्थ समाज नौ रात्रियों तक मां के चरणों में शीश नवाकर गाता है…नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमो नमः।

बदरंग दोहे . चिन्मय सायर

गोरी सुने बंगले से, कंगलों का शोर,
आर-पार मौसेरे, कौन? पकड़ेगा चोर।

इज्जत हुई तार-तार, कोयला नहीं ब्लैक,
ब्लेक हुआ तिरंगा! जी, सिर्फ नहीं फ्लैग।

आपस में मुंह बजाते, औ’ बोल हुये नीम
कोई तो ढ़ूंढ़ो रे! संविधान में हकीम।

जिस थाली में खावें, उसी में करते छेद
हंसी उड़ावें देश की, नेता करें न खेद।

बोटी-बोटी जनतंत्र, खावें ले-ले स्वाद
बूचड़खाना संसद जी, कहां करें फरियाद।

नेता-पुलिस की दोस्ती, गुंडे हुये उदास
शनैः-शनैः नेता हुये, जनता हुई ग्रास।

अस्मत लुटती देश की, नेता करें किल्लोल
कौन चढ़ेगा तख्त पर, कौन करेगा कौल।

घोटाले दर घोटाले, फिर भी ऊँची नाक
हाथ मलें जी गोरे, क्या लूटा है खाक।

कितना लूटें, क्या लूटें, होड़ मची सरकार
गांधी का स्टेच्यू देखे, देश भक्ति लाचार।

सोचो, भाई लोगों! कैसा है संविधान?
गाल बजाऊ संसद में, मेरा भारत महान।

त्रासदियों के स्नेह निमंत्रण

त्रासदियों के स्नेह निमंत्रण . डाॅ. प्रीतम अपछ्यांण
उत्तराखंड के पूर्व से पश्चिम तक फैली प्राकृतिक आपदा में काल कवलित व जड़हीन हो चुके सभी मनुष्यों के लिए अश्रुपूरित श्रद्धांजली। बाबा केदार व ‘गंगाओं’ के कोप से बच गए हम लोग यदि इस वक्त भी संवेदनहीन हो गए तो यह दूसरी त्रासदी होगी। यह केवल दुःख की घड़ी नहीं है बल्कि जीवन को नए सिरे से स्थापित करने का आरम्भ जैसा है। दो-चार महीनों में ये दुःख समाप्त नहीं होने वाले हैं। अचानक आई इस विपत्ति से जीवन खो चुके युवकों और देश के कोने-कोने से आए श्रद्धालुओं को अंतिम प्रणाम।
ऐसा क्यों हुआ? अब इस बात पर चर्चा अनिवार्य है कि आखिर ऐसा क्यों हुआ? मानसून के सामान्य मौसम से पहले ही इतनी घनी बरसात और तबाही का कारण क्या है? हर तरह के लोग, हर तरह के तर्क दे रहे हैं। श्रीनगर की ‘धारी कालिंका’ को हिलाने का परिणाम इस त्रासदी के रूप में माना जा रहा है परन्तु यह बात गले नहीं उतरती। यदि आस्थावान लोगों के इस तर्क को मान भी लें तो फिर धारी की मूर्ति हिलाने वालों की एक ‘कील’ तक क्यों नहीं बही? बीच नदी में खड़ा उनका ‘डाम’, शाफ्टें, डोजर, ट्रक, रेत के टीले, मशीनें सब तो सुरक्षित रहे, और पूरा केदारनाथ तबाह हो गया! धारीदेवी का इसमें कितना कोप है, कितना नहीं, कहा नहीं जा सकता।Image
कुछ अन्य लोग तर्क दे रहे हैं कि यह शास्त्रोक्त तथ्य था कि जब भी केदारनाथ में दस हजार से अधिक लोग हो जाएंगे, तभी ऐसी तबाही होगी। पता नहीं कि फिर विजयनगर, अगस्त्यमुनि, सिल्ली क्यों नष्ट हो गए? ऋशिकेश, हरिद्वार क्यों बाढ़ग्रस्त हुए? पिण्डरघाटी की तबाही का संबंध केदार की जनसंख्या से कैसे जोड़ा जा सकता है? बहुत से लोगों का मानना है कि धर्म के इन धामों में धर्म नाम की कोई चीज नहीं बची थी। होटल व मोटेल पिकनिक स्पाॅट हो गए थे। पूजा-अर्चना में वीआईपी टाइप का आरक्षण लागू हो गया था और दुकानों में ग्राहक देवता ‘बलि के बकरे’ बन गए थे। सामाजिक परिवर्तनों के ये प्रभाव सत्य हो सकते हैं परन्तु इनसे भी बादल फटना, आकस्मिक बाढ़, भूस्खलन व नेस्तनाबूद हो जाने का संबंध नहीं जोड़ा जा सकता। आस्थाओं के माध्यम से इसे तबाही का कारण भले ही मान लिया जाय पर सिर्फ इससे बात स्पष्ट नहीं होती।
वैज्ञानिक बिरादरी का राग थोड़ा अलग किस्म का है। नासा के सेटेलाइट चित्रों से ग्लेशियरों की हलचल को अनदेखा करना तबाही का कारण माना जा रहा है। ऐसी हलचलें तो हर वर्ष ग्लेशियरों में होती रहती है फिर तबाही का यह मंजर इसी साल क्यों? इतनी बड़ी जनहानि को प्राकृतिक कारणों से संबद्ध नहीं किया जा सकता। प्राकृतिक कारण अवस्थापनाओं को बहा सकते हैं परन्तु ‘जन’ को तो लापरवाही ने ही मारा है।
त्रासदियों के स्नेह निमंत्रण: सड़कों की राजनीति-उत्तराखंड और उसमें भी गढ़वाल का भूगोल, शेष भारत के भूगोल से काफी भिन्न है। यहां तक कि हिमालयी राज्यों में भी गढ़वाल जैसा भूगोल नहीं है। पड़ोसी कुमाऊँ में भी भौगोलिक स्थितियां गढ़वाल से भिन्न हैं। डाॅ. चारण ने कई स्थलों व गड्डियों को ‘पर्वत द्वीप’ नाम दिया है। गदेरों व नदियों के जाल ने सम्पूर्ण धरातल को कई-कई घाटियों व धारों में काट डाला है। रही सही कसर भूगर्भिक बनावटों ने पूरी की है। हर भ्रंश में एक नदी है और हर बसासत के नीचे परतदार चट्टानें, जिनके खिसकने की सर्वाधिक संभावनाएं होती हैं। बहुत सारी बसासतें तो टैलस (पुराने मलबे के ढेर) के ऊपर ही बसी हैं। तलहटी का एक पत्थर खिसका तो पूरा ढेर धड़धड़ा जाएगा। पिण्डरघाटी की सड़कें इसी कारण टूटती रहती हैं।
ऐसे भूगोल में अधिवासों तक सड़कें बनाने का कोई वैज्ञानिक नियम नहीं है। राजनीति की चैसर पर एक ही पहाड़ी, सैकड़ों मोड़ वाली सड़क काट डालती है क्योंकि उस पहाड़ी पर ‘नेता’ का गांव होता है। ‘चैंदकोट जनशक्ति मार्ग’ को छोड़कर संभवतः एक भी सड़क गढ़वाल में बिना राजनैतिक हस्तक्षेप के नहीं बनी है। जहां प्राकृतिक कारणों से सड़क बनाने की संभावना शून्य हैं, वहां भी जबरदस्ती सड़कें बनी हैं और ऐसी कि जिन पर शायद कई-कई किमी तक कोई बसासत ही नहीं है।
विकास के पैमाने-इस तथ्य से कोई इंकार नहीं कर सकता कि विकास का रास्ता सड़कों से ही गुजरता है। जब तक हर बसासत सड़क मार्ग से नहीं जुड़ती, तब तक कोई भी स्वयं को विकसित नहीं मान सकता। राज्य के स्तर पर यह तथ्य बेहद अफसोसनाक है कि विगत 12 वर्षों में सड़क निर्माण की कोई योजना नहीं बन पाई। ऐसे में राज्य के विकास का मापन कैसे हो सकता है?
वर्तमान में विकास का सीधा सा अर्थ है-सुविधाएं, आवास, भोजन, अस्पताल, बैंक-डाकघर, स्कूल, पेयजल, संपर्क-नेटवर्क, विद्युत और स्वच्छता; इतनी ही चीजों से विकास की सामूहिक रूपरेखा बनती है। व्यक्तिगत आय व भौतिक वस्तुओं को जमा करने से सामाजिक विकास नहीं आंका जा सकता। उदाहरण के लिए किसी व्यक्ति के पास अकूत धन है पर राशन उपलब्ध नहीं या लेटेस्ट माॅडल की कार है पर सड़क नहीं है, तो ऐसे में उसे विकसित नहीं कहा जा सकता। धन या कार व्यक्तिगत होती हैं पर सड़क व राशन सामूहिक, इसलिए विकास को व्यक्तिगत तौर पर आंकना गलत होगा। विकास की उक्त सुविधाएं निश्चित तौर पर सड़क मार्ग से ही आती हैं जो उत्तराखंड में किसी नियम में शामिल नहीं हैं।
सड़कांे के निकट लगातार घनी होती जा रही आबादी के पीछे एकमात्र कारण यही है कि वहां सड़क है। ‘रोडहैड’ पर बसना विकास की मानसिकता है जो कतई गलत नहीं है परन्तु बिना किसी नियम के बन रही सड़कों से ‘लोगों को सड़क पर आना’ पड़ रहा है जबकि ‘सड़क को लोगों तक जाना’ चाहिए था।
नदियों का मोह-आपात स्थितियां अपवाद हो सकती हैं परन्तु उत्तराखंड में सामान्य तौर पर सड़क निर्माण में नदियों का मोह दिखता है और यह मोह ही त्रासदियों को निमंत्रण देता है। गढ़वाल की आपदा में इस मोह का परिणाम आज सबके सामने है। नदियों से दूर के गांव व सड़कें सही सलामत हैं परन्तु नदी तटों पर तबाही है। सड़क की लम्बाई कम करने की चाह में नदी का मार्ग चुना जाता है पर यह तथ्य भुला दिया जाता है कि यदि वहां सड़क होगी तो लोग भी बसने आएंगे। आवास व अन्य सुविधाएं जुटाई जाएंगी और दुर्भाग्य से आपदाओं को आमंत्रित किया जाएगा। सड़क की लम्बाई भले ही कितनी हो जाए पर इसका निर्माण संपर्क में आने वाले गांवों के अनुसार किया जाए तो बसासतें नदी तटों पर नहीं खिसकेंगी। अल्मोड़ा, रानीखेत, कौसानी, मसूरी, लैंसडाउन इस बात के प्रमाण हैं कि सड़कें ऊपर रही तो लोग भी ऊपर बसे। ऋषिकेश, देवप्रयाग, कर्णप्रयाग, नंदप्रयाग, चमोली, विष्णुप्रयाग, अगस्त्यमुनि, सतपुली इस बात के उदाहरण हैं कि सड़कें नदी तटों पर र्गइं तो लोग भी खिसककर नीचे आ गए। इस बार ऐसे ही स्थानों पर तबाही का मंजर है। धार्मिक स्थलों व प्रयागांे तक सड़क ले जाना भी एक विडम्बना है। यदि पिण्डर घाटी की सड़क केदारुखाल की सीध में कर्जनमार्ग पर होती हुई ग्वालदम और घूम कर सवाड़, मुंदोली, गंगसार, सणकोट होती हुई नैनीसैंण होती तो आज देवाल, थराली, नारायणबगड़ में इतने घर नहीं बहे होते। दूसरी बात यह कि प्रयागों तक सड़क नहीं भी होती तो भी प्रयाग अपने पूरे महात्म्य के साथ वहीं होते। लोग प्रयागों में फिर भी जाते पर बसते नहीं और बहते नहीं। बद्रीनाथ तक सड़क नहीं होती तो भी ‘बद्री’ का महत्व घटता नहीं। सड़क निर्माण का कोई नियम व वैज्ञानिक आधार न होने से आपदाएं ही तो आमंत्रित होंगी।
बसासतों का विकेंद्रीकरण कीजिए-हमारे देश में और उत्तराखंड में भी विकास का सारा ध्यान शहरों पर है। बसासतों का निरन्तर केंद्रीकरण हो रहा है जो सामाजिक और राजनैतिक समस्याएं पैदा कर रहा है। इस केंद्रीकरण के पीछे भी मुख्य हाथ सड़कों का है। सड़कें गांवों तक ले जाई जांए तो गांवों को सड़क पर खिसककर आने की कोई जरूरत नहीं होगी। उत्पादन को बाजारों तक लाने या वितरण करने में भी समस्या नहीं रहेगी पर ऐसा होता नहीं दिख रहा है। शहरों में झुग्गियों की संख्या निरन्तर बढ़ रही है और ग्रामीण बसासतों व आबाद स्थलों की संख्या लगातार घट रही है। ये घटे हुए लोग कहां जा रहे हैं और क्यों जा रहे हैं? सुविधाओं के लिए सड़क किनारे? परन्तु सड़कें नेताओं की कृपा से बन रही हैं जो बसासतों के केंद्रीकरण के लिए प्रेरित कर रही हैं। आपदा के दिनों में यही केंद्रीकरण इन बसासतों की कब्रगाह बन रहा है।
उपाय क्या है?-इन स्थितियों का स्थाई व प्रभावी उपाय है कि सड़क अधिनियम बनाकर इसे राजनैतिक और प्रशासनिक हस्तक्षेपों से एकदम मुक्त कर दिया जाय। संपूर्ण भूगोल का सर्वेक्षण करके विशेषज्ञों द्वारा सड़क मार्ग का निर्धारण करके, कम से कम विस्फोट व अधिक से अधिक गांवों का जुड़ाव सुनिश्चित किया जाय। सड़क की लम्बाई भले ही कितनी अधिक हो जाय पर एक ही ढलान पर घूम-दर-घूम से बचकर इसका निर्माण किया जाय।
शहरों व कस्बों के लिए नए मानक तय हों कि वहां अधिक से अधिक कितने आवास हो सकते हैं। एक आवास के साथ कितनी खाली भूमि पौधों के लिए रहे। इनके बिना नक्शे पास न हों। सरकारी संस्थान अनुपजाऊ भूमि पर बने और कृषि भूमि उत्पादन के लिए सुरक्षित रखी जाय। एक ही तथ्य शेष रहता है पर्यावरण संरक्षण का। पहला तथ्य इसमें यह है कि उत्तराखंड की आपदाग्रस्त समस्तभूमि को आरक्षित घोषित करके ‘वृक्षविहीन’ वनों का वनीकरण कर दिया जाय। वनों की रक्षा व निर्माण की जिम्मेदारी उन स्थानीय बसासतों को सौंप दी जाय जो ‘नदी मोह की सड़कों पर’ नहीं खिसके हैं। यह वैज्ञानिक तौर पर सिद्ध तथ्य है कि बसासतें जितनी छोटी व अधिक संख्या में होती हैं, पर्यावरण संरक्षण उतना ही अधिक प्रभावी होता है। सुरक्षित सड़कें एक बार का निर्माण होती हैं इसलिए बार-बार कटान की जरूरत नहीं है। एक बार राज्य के सभी सोलह हजार गांव सड़क से जुड़ जायं तो फिर सड़क कटान की जरूरत नहीं। शेष भूमि पर वनों को कोई खतरा नहीं।
सरकारें ऐसा करेंगी, उम्मीद कम है क्योंकि नेता-ठेकेदार-पीडब्ल्युडी- प्रशासन ‘सड़क रिपेयर’ की मुर्गी और वन-पर्यावरण विभाग ‘अड़ंगे की दादागिरी’ नहीं छोड़ने वाले हैं। ये ‘मुआवजा वितरण विभाग’ टाइप की सरकारें हैं। राज्यविकास व जनसुरक्षा की सोच जनता के बीच से ही आएगी। यही सोच राज्य में सड़कों व लोगों का भविष्य तय कर सकेगी।

त्रासदी के बाद

त्रासदी के बाद . डा0 अ0 कीर्तिबर्द्धन
कब मौसम ने घात दी,
कब बरसी बरसात
जितनी भी लाशें दिखीं,
सब किस्मत की बात
अपने गुनाहों का दोष,
बादलों को न दीजिये,
नदियों के रास्ते में
रूकावट न कीजिये।
अपने स्वार्थ में काटकर
वन-वृक्ष सारे,
पर्वतों के तन को
नंगा न कीजिये।